यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
Page 352 of 429
Read in context॥ ॐ श्री परमात्मने नमः॥ ॥अथ सप्तदशोऽध्यायः॥ अध्याय सोलह के अन्त में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कहा कि काम, क्रोध और लोभ के त्यागने पर ही कर्म आरम्भ होता है, जिसे मैंने बार-बार कहा है। नियत कर्म को बिना किये न सुख, न सिद्धि और न परमगति ही मिलती है। इसलिये अब तुम्हारे लिये कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य की व्यवस्था में कि क्या करूँ, क्या न करूँ?- इस सम्बन्ध में शास्त्र ही प्रमाण है। कोई अन्य शास्त्र नहीं; बल्कि 'इति गुह्यतमं शास्त्रमिदम्।' (१५/२०) गीता स्वयं शास्त्र है। अन्य शास्त्र भी हैं; किन्तु यहाँ इसी गीताशास्त्र पर दृष्टि रखें, दूसरा न ढूँढ़ने लगें। दूसरी जगह ढूँढ़ेंगे तो यह क्रमबद्धता नहीं मिलेगी, अतः भटक जायेंगे। इस पर अर्जुन ने प्रश्न किया कि भगवन्! जो लोग शास्त्रविधि को त्यागकर पूर्ण श्रद्धा से युक्त होकर 'यजन्ते'- यजन करते हैं, उनकी गति कैसी है? सात्त्विकी है, राजसी अथवा तामसी है? क्योंकि पीछे अर्जुन ने सुना था कि सात्त्विक, राजस अथवा तामस, जब तक गुण विद्यमान हैं, किसी-न- किसी योनि के ही कारण होते हैं। इसलिये प्रस्तुत अध्याय के आरम्भ में ही उसने प्रश्न रखा- अर्जुन उवाच ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः। तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः ॥१॥ हे कृष्ण ! जो मनुष्य शास्त्रविधि को छोड़कर श्रद्धासहित यजन करते हैं, उनकी गति कौन-सी है? सात्त्विकी है, राजसी है अथवा तामसी है? यजन में देवता, यक्ष, भूत इत्यादि सभी आ जाते हैं।