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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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३१८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता श्रीभगवानुवाच त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा। सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु।।२।। अध्याय दो में योगेश्वर ने बताया कि- अर्जुन! इस योग में निर्धारित क्रिया एक ही है। अविवेकियों की बुद्धि अनन्त शाखाओंवाली होती है, इसलिये वे अनन्त क्रियाओं का विस्तार कर लेते हैं। दिखावटी शोभायुक्त वाणी में उसे व्यक्त भी करते हैं। उनकी वाणी की छाप जिनके चित्त पर पड़ती है, अर्जुन! उनकी भी बुद्धि नष्ट हो जाती है, न कि कुछ पाते हैं। ठीक इसी की पुनरावृत्ति यहाँ पर भी है कि जो ‘शास्त्रविधिमुत्सृज्य’– शास्त्रविधि को त्यागकर भजते हैं, उनकी श्रद्धा भी तीन प्रकार की होती है। इस पर श्रीकृष्ण ने कहा- मनुष्य की आदत से उत्पन्न हुई वह श्रद्धा सात्त्विकी, राजसी तथा तामसी- ऐसे तीन प्रकार की होती है, उसे तू मुझसे सुन। मनुष्य के हृदय में यह श्रद्धा अविरल है। सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत। श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः।।३।। हे भारत! सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके चित्त की वृत्तियों के अनुरूप होती है। यह पुरुष श्रद्धामय है। इसलिये जो पुरुष जैसी श्रद्धावाला है, वह स्वयं भी वही है। प्रायः लोग पूछते हैं- मैं कौन हूँ? कोई कहता है- मैं तो आत्मा हूँ। किन्तु नहीं, यहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि जैसी श्रद्धा, जैसी वृत्ति वैसा पुरुष। गीता योग-दर्शन है। महर्षि पतंजलि भी योगी थे। उनका योग-दर्शन है। योग है क्या? उन्होंने बताया- ‘योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।’ ( १/२ ) चित्त की वृत्तियों का सर्वथा रुक जाना योग है। किसी ने परिश्रम करके रोक ही लिया, तो लाभ क्या है? ‘तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्।’ ( १/३ )- उस समय यह द्रष्टा जीवात्मा अपने ही शाश्वत स्वरूप में स्थित हो जाता है। क्या स्थित