यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in context३३२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता श्रीभगवानुवाच काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्न्यासं कवयो विदुः। सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः॥२॥ अर्जुन! कितने ही पण्डितजन काम्य कर्मों के त्याग को संन्यास कहते हैं और कितने ही विचार-कुशल पुरुष सम्पूर्ण कर्मफलों के त्याग को त्याग कहते हैं। त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः। यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे॥३॥ कई एक विद्वान् ऐसा कहते हैं कि सभी कर्म दोषयुक्त हैं, अतः त्याग देने योग्य हैं और दूसरे विद्वान् ऐसा कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप त्यागने योग्य नहीं हैं। इस प्रकार अनेक मत प्रस्तुत करके योगेश्वर अपना भी निश्चित मत देते हैं- निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम। त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः॥४॥ हे अर्जुन! उस त्याग के विषय में तू मेरे निश्चय को सुन। हे पुरुषश्रेष्ठ! वह त्याग तीन प्रकार का कहा गया है। यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्। यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥५॥ यज्ञ, दान और तप- ये तीन प्रकार के कर्म त्यागने योग्य नहीं हैं, इन्हें तो करना ही चाहिये; क्योंकि यज्ञ, दान और तप तीनों ही पुरुषों को पवित्र करने वाले हैं। श्रीकृष्ण ने चार प्रचलित मतों का उल्लेख किया। पहला- काम्य कर्मों का त्याग, दूसरा- सम्पूर्ण कर्मफलों का त्याग, तीसरा- दोषयुक्त होने के कारण सभी कर्मों का त्याग और चौथा मत- यज्ञ, दान और तप त्यागने योग्य नहीं हैं। उनमें से एक मत में अपनी सहमति प्रकट करते हुए कहा- अर्जुन! मेरा भी यह निश्चित किया हुआ मत है कि यज्ञ, दान और तपरूप क्रिया