यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in contextअष्टादश अध्याय ३३३ त्यागने योग्य नहीं है। इससे सिद्ध है कि कृष्णकाल में भी कई मत प्रचलित थे, जिनमें एक यथार्थ था। उस काल में भी कई मत थे, आज भी हैं। महापुरुष जब दुनिया में आता है तो कई मत-मतान्तरों में से कल्याणकारी मत को निकालकर सामने खड़ा कर देता है। प्रत्येक महापुरुष ने यही किया है, श्रीकृष्ण ने भी यही किया। उन्होंने कोई नया मार्ग नहीं बताया, बल्कि प्रचलित कई मतों के बीच सत्य को समर्थन देकर उसे स्पष्ट कर दिया। एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च। कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्॥६॥ योगेश्वर श्रीकृष्ण बल देकर कहते हैं- पार्थ! यज्ञ, दान और तपरूप कर्म आसक्ति और फल को त्यागकर अवश्य करना चाहिये। यह मेरा निश्चय किया हुआ उत्तम मत है। अब अर्जुन के प्रश्न के अनुसार वे त्याग का विश्लेषण करते हैं- नियतस्य तु सन्न्यासः कर्मणो नोपपद्यते। मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः॥७॥ हे अर्जुन! नियत कर्म (श्रीकृष्ण के शब्दों में नियत कर्म एक ही है, यज्ञ की प्रक्रिया। इस नियत शब्द को आठ-दस बार योगेश्वर ने कहा। इस पर बार-बार बल दिया कि कहीं साधक भटककर दूसरा न करने लगे), इस शास्त्रविधि से निर्धारित कर्म का त्याग करना उचित नहीं है। मोह से उसका त्याग करना तामस त्याग कहा गया है। सांसारिक विषय-वस्तुओं की आसक्ति में फँसकर कार्यम् कर्म (कार्यम् कर्म, नियत कर्म एक दूसरे के पूरक हैं) का त्याग तामसी है। ऐसा पुरुष ‘अधः गच्छति’- कीट-पतंगपर्यन्त अधम योनियों में जाता है; क्योंकि उसने भजन की प्रवृत्तियों का त्याग कर दिया। अब राजस त्याग के विषय में बताते हैं- दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्। स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्॥८॥ कर्म को दुःखमय समझकर शारीरिक क्लेश के भय से उसका त्याग करनेवाला व्यक्ति राजस त्याग को करके भी त्याग के फल को प्राप्त नहीं