यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in context३३४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता होता। जिससे भजन पार न लगे और 'कायक्लेशभयात्'– इस भय से कर्म को त्याग दे कि शरीर को कष्ट होगा, उस मनुष्य का त्याग राजस है। उसे त्याग का फल परमशान्ति नहीं प्राप्त होती। तथा- कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन। सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः।।९।। हे अर्जुन! करना कर्तव्य है- ऐसा समझकर जो 'नियतम्'– शास्त्र- विधि से निर्धारित किया हुआ कर्म संगदोष और फल को त्यागकर किया जाता है, वही सात्त्विक त्याग है। अतः नियत कर्म करें और इसके सिवाय जो कुछ है, उसका त्याग कर दें। यह नियत कर्म भी क्या करते ही रहेंगे या कभी इसका भी त्याग होगा? इस पर कहते हैं (अब अन्तिम त्याग का रूप देखें)- न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते। त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ।।१०।। हे अर्जुन! जो पुरुष 'अकुशलं कर्म' अर्थात् अकल्याणकारी कर्म से (शास्त्र नियत कर्म ही कल्याणकारी है। इसके विरोध में जो कुछ है, इसी लोक का बन्धन है इसलिये अकल्याणकारी है, ऐसे कर्मों से) द्वेष नहीं करता और कल्याणकारी कर्म में आसक्त नहीं होता, जो करना था वह भी शेष नहीं है- ऐसा सत्त्व से संयुक्त पुरुष संशयरहित, ज्ञानवान् और त्यागी है। उसने सब कुछ त्यागा है, लेकिन प्राप्ति के साथ वह पूर्ण त्याग ही संन्यास है। हो सकता है और कोई सरल रास्ता हो? इस पर कहते हैं-नहीं। देखें- न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः। यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ।।११।। देहधारी पुरुषों के द्वारा (केवल शरीर ही नहीं, जिसे आप देखते हैं। श्रीकृष्ण के अनुसार प्रकृति से उत्पन्न सत्त्व, रज, तम तीनों गुण ही इस जीवात्मा को शरीरों में बाँधते हैं। जब तक गुण जीवित हैं तब तक वह जीवधारी है। किसी-न-किसी रूप में शरीर परिवर्तित होता रहेगा। अतः देह के कारण जब तक जीवित है।) सम्पूर्णता से सब कर्मों का त्याग संभव नहीं है, इसलिये जो पुरुष कर्म के फल का त्यागी है, वही त्यागी है- ऐसा कहा