यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in contextअष्टादश अध्याय ३३७ ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना। करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः॥१८॥ अर्जुन ! परिज्ञाता अर्थात् पूर्णज्ञाता महापुरुषों से, 'ज्ञानम्'- उसको जानने की विधि से और 'ज्ञेयम्' - जानने योग्य वस्तु ( श्रीकृष्ण ने पीछे कहा कि मैं ही ज्ञेय, जानने योग्य पदार्थ हूँ) से कर्म करने की प्रेरणा मिलती है। पहले तो पूर्णज्ञाता कोई महापुरुष हो, उनके द्वारा उस ज्ञान को जानने की विधि प्राप्त हो, लक्ष्य- ज्ञेय पर दृष्टि हो तभी कर्म की प्रेरणा मिलती है और कर्त्ता (मन की लगन), करण (विवेक, वैराग्य, शम, दम इत्यादि) तथा कर्म की जानकारी से कर्म का संग्रह होता है, कर्म इकट्ठा होने लगता है। पीछे कहा गया कि प्राप्ति के पश्चात् उस पुरुष का कर्म किये जाने से कोई प्रयोजन नहीं होता और न छोड़ने से हानि ही होती है; फिर भी लोकसंग्रह अर्थात् पीछेवालों के हृदय में कल्याणकारी साधनों के संग्रह के लिये वह कर्म में बरतता है। कर्त्ता, करण और कर्म के द्वारा इनका संग्रह होता है। ज्ञान, कर्म और कर्त्ता के भी तीन-तीन भेद हैं- ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः। प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि॥१९॥ ज्ञान, कर्म तथा कर्त्ता भी गुणों के भेद से सांख्यशास्त्र में तीन- तीन प्रकार के कहे गये हैं, उन्हें भी तू यथावत् सुन। प्रस्तुत है पहले ज्ञान का भेद- सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते। अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्॥२०॥ अर्जुन ! जिस ज्ञान से मनुष्य पृथक्-पृथक् सब भूतों में एक अविनाशी परमात्मभाव को विभागरहित एकरस देखता है, उस ज्ञान को तू सात्त्विक जान। ज्ञान प्रत्यक्ष अनुभूति है, जिसके साथ ही गुणों का अन्त होना है। यह ज्ञान की परिपक्व अवस्था है। अब राजस ज्ञान देखें- पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्। वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्॥२१॥ जो ज्ञान सम्पूर्ण भूतों में भिन्न प्रकार के अनेक भावों को अलग-अलग