भारतकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

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३३८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता करके जानता है कि यह अच्छा है, ये बुरे हैं- उस ज्ञान को तू राजस जान। ऐसी स्थिति है तो राजसी स्तर पर तुम्हारा ज्ञान है। अब देखें तामस ज्ञान- यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्। अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम्।।२२।। जो ज्ञान एकमात्र शरीर में ही सम्पूर्णता के सदृश आसक्त है, युक्तिरहित अर्थात् जिसके पीछे कोई क्रिया नहीं है, तत्त्व के अर्थस्वरूप परमात्मा की जानकारी से अलग करनेवाला और तुच्छ है, वह ज्ञान तामस कहा जाता है। अब प्रस्तुत है कर्म के तीन भेद- नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम्। अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते।।२३।। जो कर्म ‘नियतम्’- शास्त्रविधि से निर्धारित है (अन्य नहीं), संगदोष और फल को न चाहनेवाले पुरुष द्वारा बिना राग-द्वेष के किया जाता है, वह कर्म सात्त्विक कहा जाता है। [नियत कर्म (आराधना) चिन्तन है, जो परम में प्रवेश दिलाता है।] यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः। क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्।।२४।। जो कर्म बहुत परिश्रम से युक्त है, फल को चाहनेवाले और अहंकारयुक्त पुरुष द्वारा किया जाता है, वह कर्म राजस कहा जाता है। यह पुरुष भी वही नियत कर्म करता है; किन्तु अन्तर मात्र इतना ही है कि फल की इच्छा और अहंकार से युक्त है इसलिये उसके द्वारा होनेवाले कर्म राजस हैं। अब देखें तामस- अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुषम्। मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते।।२५।। जो कर्म अन्ततः नष्ट होनेवाला है, हिंसा-सामर्थ्य को न विचार कर केवल मोहवश आरम्भ किया जाता है, वह कर्म तामस कहा जाता है। स्पष्ट है कि यह कर्म शास्त्र का नियत कर्म नहीं है, उसके स्थान पर भ्रान्ति है। अब देखें कर्त्ता के लक्षण-