यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in context३४० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता पार्थ! प्रवृत्ति और निवृत्ति को, कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य को, भय और अभय को तथा बन्धन और मोक्ष को जो बुद्धि यथार्थ जानती है, वह बुद्धि सात्त्विकी है। अर्थात् परमात्म-पथ, आवागमन-पथ दोनों की भली प्रकार जानकारीवाली बुद्धि सात्त्विकी है। तथा- यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च। अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी।।३१।। पार्थ! जिस बुद्धि द्वारा मनुष्य धर्म और अधर्म को तथा कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य को भी यथावत् नहीं जानता, अधूरा जानता है, वह बुद्धि राजसी है। अब तामसी बुद्धि का स्वरूप देखें- अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता। सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी।।३२।। पार्थ! तमोगुण से ढँकी हुई जो बुद्धि अधर्म को धर्म मानती है तथा सम्पूर्ण हितों को विपरीत ही देखती है, वह बुद्धि तामसी है। यहाँ श्लोक तीस से बत्तीस तक बुद्धि के तीन भेद बताये गये। जो बुद्धि किस कार्य से निवृत्त होना है और किसमें प्रवृत्त होना है, कौन कर्त्तव्य है और कौन अकर्त्तव्य है- इसकी भली प्रकार जानकारी रखती है, वह बुद्धि सात्त्विकी है। जो कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य को धूमिल ढंग से जानती है, यथार्थ नहीं जानती- वह राजसी बुद्धि है और अधर्म को धर्म, नश्वर को शाश्वत तथा हित को अहित- इस प्रकार विपरीत जानकारीवाली बुद्धि तामसी है। इस प्रकार बुद्धि के भेद समाप्त हुए। अब प्रस्तुत है दूसरा प्रश्न, 'धृति'- धारणा के तीन भेद- धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः। योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी।।३३।। 'योगेन'- यौगिक प्रक्रिया के द्वारा 'अव्यभिचारिणी'- योग-चिन्तन के अलावा दूसरे किसी स्फुरण का आना व्यभिचार है, चित्त का बहक जाना व्यभिचार है; इसके विपरीत अव्यभिचारिणी धारणा से मनुष्य मन, प्राण और इन्द्रियों की क्रिया को जो धारण करता है, वह धारणा सात्त्विकी है।