यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in contextअष्टादश अध्याय ३४१ अर्थात् मन, प्राण और इन्द्रियों को इष्ट की दिशा में मोड़ना ही सात्त्विकी धारणा है। तथा- यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन। प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी।।३४।। हे पार्थ! फल की इच्छावाला मनुष्य अति आसक्ति से जिस धारणा के द्वारा केवल धर्म, अर्थ और काम को धारण करता है (मोक्ष को नहीं), वह धारणा राजसी है। इस धारणा में भी लक्ष्य वही है, केवल कामना करता है। जो कुछ करता है, उसके बदले में चाहता है। अब तामसी धारणा के लक्षण देखें- यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च। न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी।।३५।। हे पार्थ! दुष्ट बुद्धिवाला मनुष्य जिस धारणा के द्वारा निद्रा, भय, चिन्ता, दुःख और अभिमान को भी (नहीं छोड़ता इन सबको) धारण किये रहता है, वह धारणा तामसी है। यह प्रश्न पूरा हुआ। अगला प्रश्न है, सुख- सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ। अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति।।३६।। अर्जुन! अब सुख भी तीन प्रकार का मुझसे सुन। उनमें से जिस सुख में साधक अभ्यास से रमण करता है अर्थात् चित्त को समेटकर इष्ट में रमण करता है और जो दुःखों का अन्त करनेवाला है तथा- यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्। तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्।।३७।। उपर्युक्त सुख साधन के आरम्भकाल में यद्यपि विष के सदृश लगता है (प्रह्लाद को शूली पर चढ़ाया गया, मीरा को विष मिला। कबीर कहते हैं- ‘सुखिया सब संसार है, खाये अरु सोवै। दुखिया दास कबीर है, जागे अरु रोवै।’ अतः आरम्भ में विष-जैसा भासता है) परन्तु परिणाम में अमृततुल्य है, अमृत-तत्त्व को दिलानेवाला है, अतः आत्मविषयक बुद्धि के प्रसाद से उत्पन्न हुआ सुख सात्त्विक कहा गया है। तथा-