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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता इस सेना में 'महेष्वासाः'- महान् ईश में वास दिलानेवाले, भावरूपी 'भीम', अनुरागरूपी 'अर्जुन' के समान बहुत से शूरवीर, जैसे- सात्त्विकतारूपी 'सात्यकि', 'विराटः'- सर्वत्र ईश्वरीय प्रवाह की धारणा, महारथी राजा द्रुपद अर्थात् अचल स्थिति तथा- धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान्। पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः॥५॥ 'धृष्टकेतुः'- दृढ़कर्तव्य, 'चेकितानः'- जहाँ भी जाय, वहाँ से चित्त को खींचकर इष्ट में स्थिर करना, 'काशिराजः'- कायारूपी काशी में ही वह साम्राज्य है, 'पुरुजित्'- स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों पर विजय दिलानेवाला पुरुजित्, 'कुन्तिभोजः'- कर्तव्य से भव पर विजय, नरों में श्रेष्ठ 'शैब्य' अर्थात् सत्य व्यवहार- युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्। सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः॥६॥ और पराक्रमी 'युधामन्युः'- युद्ध के अनुरूप मन की धारणा, 'उत्तमौजाः'- शुभ की मस्ती, सुभद्रापुत्र अभिमन्यु- जब शुभ आधार आ जाता है तो मन भय से रहित हो जाता है- ऐसा शुभ आधार से उत्पन्न अभय मन, ध्यानरूपी द्रौपदी के पाँचों पुत्र- वात्सल्य, लावण्य, सहृदयता, सौम्यता, स्थिरता सब-के-सब महारथी हैं। साधन-पथ पर सम्पूर्ण योग्यता के साथ चलने की क्षमताएँ हैं। इस प्रकार दुर्योधन ने पाण्डव-पक्ष के पन्द्रह-बीस नाम गिनाये, जो दैवी सम्पद् के महत्त्वपूर्ण अंग हैं। विजातीय प्रवृत्तियों का राजा होते हुए भी 'मोह' ही सजातीय प्रवृत्तियों को समझने के लिये बाध्य करता है। दुर्योधन अपना पक्ष संक्षेप में कहता है। यदि कोई बाह्य युद्ध होता तो अपनी फौज बढ़ा-चढ़ाकर गिनाता। विकार कम गिनाये गये; क्योंकि उन पर विजय पाना है, वे नाशवान् हैं। केवल पाँच-सात विकार बताये गये, जिनके अन्तराल में सम्पूर्ण बहिर्मुखी प्रवृत्तियाँ विद्यमान हैं। जैसे- अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम। नायका मम सैन्यस्य सञ्ज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते॥७॥