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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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प्रथम अध्याय ५ द्विजोत्तम! हमारे पक्ष में जो-जो प्रधान हैं, उन्हें भी आप समझ लें। आपको जानने के लिये मेरी सेना के जो-जो नायक हैं, उनको कहता हूँ। बाह्य युद्ध में सेनापति के लिये 'द्विजोत्तम' सम्बोधन असामयिक है। वस्तुतः 'गीता' में अन्तःकरण की दो प्रवृत्तियों का संघर्ष है। जिसमें द्वैत का आचरण ही 'द्रोण' है। जब तक हम लेशमात्र भी आराध्य से अलग हैं, तब तक प्रकृति विद्यमान है, द्वैत बना है। इस 'द्वि' पर जय पाने की प्रेरणा प्रथम गुरु द्रोणाचार्य से मिलती है। अधूरी शिक्षा ही पूर्ण जानकारी के लिये प्रेरणा प्रदान करती है। वह पूजास्थली नहीं, वहाँ शौर्यसूचक सम्बोधन होना चाहिये। विजातीय प्रवृत्ति के नायक कौन-कौन हैं?- भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः। अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च।।८।। एक तो स्वयं आप (द्वैत के आचरणरूपी द्रोणाचार्य) हैं, भ्रमरूपी पितामह 'भीष्म' हैं। भ्रम इन विकारों का उद्गम है। अन्त तक जीवित रहता है, इसलिये पितामह है। समूची सेना मर गयी, यह जीवित था। शरशय्या पर अचेत था, फिर भी जीवित था। यह है भ्रमरूपी 'भीष्म'। भ्रम अन्त तक रहता है। इसी प्रकार विजातीय कर्मरूपी 'कर्ण' तथा संग्रामविजयी 'कृपाचार्य' हैं। साधनावस्था में साधक द्वारा कृपा का आचरण ही 'कृपाचार्य' है। भगवान कृपाधाम हैं और प्राप्ति के पश्चात् सन्त का भी वही स्वरूप है। किन्तु साधनकाल में जब तक हम अलग हैं, परमात्मा अलग है, विजातीय प्रवृत्ति जीवित है, मोहमयी घिराव है- ऐसी परिस्थिति में साधक यदि कृपा का आचरण करता है तो वह नष्ट हो जाता है। सीता ने दया की तो कुछ काल लंका में प्रायश्चित करना पड़ा। विश्वामित्र दयार्द्र हुए तो पतित होना पड़ा। योगसूत्रकार महर्षि पतंजलि भी यही कहते हैं- 'ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः।' (योगदर्शन, ३/३७) व्युत्थानकाल में सिद्धियाँ प्रकट होती हैं। वे वास्तव में सिद्धियाँ हैं; किन्तु कैवल्यप्राप्ति के लिये उतनी ही बड़ी विघ्न हैं जितने काम, क्रोध, लोभ, मोह इत्यादि। गोस्वामी तुलसीदास का भी यही निर्णय है-