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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता छोरत ग्रन्थि जानि खगराया। बिघ्न अनेक करइ तब माया।। रिद्धि सिद्धि प्रेरइ बहु भाई। बुद्धिहि लोभ दिखावहिं आई।। ( रामचरितमानस, ७/११७/६-७ ) माया अनेक विघ्न करती है, ऋद्धियाँ प्रदान करती है, यहाँ तक कि सिद्ध बना देती है। ऐसी अवस्थावाला साधक बगल से निकल भर जाय, मरणासन्न रोगी भी जी उठेगा। वह भले ठीक हो जाय, किन्तु साधक उसे अपनी देन मान बैठे तो नष्ट हो जायेगा। एक रोगी के स्थान पर हजारों रोगी घेर लेंगे, भजन-चिन्तन का क्रम अवरुद्ध हो जायेगा और उधर बहकते-बहकते प्रकृति का बाहुल्य हो जायेगा। यदि लक्ष्य दूर है और साधक कृपा करता है तो कृपा का अकेला आचरण ही ‘समितिञ्जय:’– समूची सेना को जीत लेगा। इसलिये साधक को पूर्तिपर्यन्त इससे सतर्क रहना चाहिये। ‘दया बिनु सन्त कसाई, दया करी तो आफत आई।’ लेकिन अधूरी अवस्था में यह विजातीय प्रवृत्ति का दुर्धर्ष योद्धा है। इसी प्रकार आसक्तिरूपी अश्वत्थामा। सृष्टि में कहीं भी वस्तुओं में लगाव ही आसक्ति है। द्वैत का आचरण द्रोणाचार्य है। द्वैत ही आसक्ति का जन्मदाता है। शस्त्र हाथ में रहते आचार्य द्रोण की मृत्यु नहीं हो सकती थी, वह अजेय थे। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, “कौरव-पक्ष में एक हाथी का नाम अश्वत्थामा है। भीम उस हाथी को मारकर ‘अश्वत्थामा मारा गया’–ऐसा उद्घोष करें। इस अप्रिय सूचना से आचार्य मर्माहत हो शिथिल पड़ जायेंगे। उसी समय उनका अन्त कर दिया जाय।” भीम ने हाथी को मार डाला, प्रचार किया कि अश्वत्थामा मारा गया। आचार्य द्रोण ने समझा कि उनका पुत्र अश्वत्थामा मारा गया। वे शिथिल पड़ गये, धनुष हाथ से गिर गया। वह हताश निश्चेष्ट होकर युद्धभूमि में बैठ गये। उनका गला कट गया। पुत्र में अत्यधिक आसक्ति उनकी मृत्यु का कारण बनी। अश्वत्थामा दीर्घजीवी था। निवृत्ति के अन्तिम क्षणों तक यह बाधा के रूप में विद्यमान रहता है, इसीलिये अमर कहलाया। विकल्परूपी विकर्ण। साधना की उन्नत अवस्था में विशिष्ट कल्पनाएँ उठने लगती हैं। मन में संकल्प-विकल्प होने लगता है कि स्वरूप-प्राप्ति के साथ भगवान की ओर से कौन-सी सिद्धियाँ, अलौकिक शक्तियाँ प्रदान की