यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in contextप्रथम अध्याय ७ जायेंगी? भगवान के चिन्तन के स्थान पर विभूतियों का चिन्तन होने लगता है। साधक की दृष्टि केवल कर्म पर होनी चाहिये, उसे फल की वासनावाला नहीं होना चाहिये; किन्तु जब वह ऋद्धियों-सिद्धियों का चिन्तन करने लगता है, यह विकल्प ही विकर्ण है। ये कल्पनाएँ विशिष्ट हैं, किन्तु साधना में भयंकर बाधक हैं। भ्रममयी श्वास ही भूरिश्रवा है। साधन का स्तर उन्नत होने पर उसकी प्रशंसा होने लगती है कि वह महात्मा है, सिद्ध है, उसमें दिव्य शक्तियाँ हैं, उसके समक्ष लोकपाल भी नतमस्तक हो जाते हैं। इस आवभाव, प्रशस्ति से साधक प्रसन्न होने लगे, गद्गद होकर बहकने लगे- यह भ्रममयी श्वास ही भूरिश्रवा है। पूज्य गुरुदेव का कथन था- “संसार पुष्पवृष्टि करे, प्रशंसा करे, विश्व जगद्गुरु कहे- तुम्हें कुछ भी नहीं मिलेगा, रोने को आँसू नहीं मिलेगा ! यदि भगवान तुम्हें साधु कह दें तो सब कुछ पा जाओगे। दुनिया कहे चाहे कभी न कहे, फिर भी तुम सर्वस्व प्राप्त कर लोगे।” इस प्रकार सांसारिक प्रशंसा में बह जाना भ्रममयी श्वास है, यही भूरिश्रवा है। प्रशंसा भूरि-भूरि है, अत्यधिक है, अतिरंजित है; इससे साधना में स्राव (घटाव, क्षय) होने लगता है। अस्तु, भ्रममयी श्वास भूरिश्रवा है। संयम का स्तर उन्नत होने पर आयी हुई विकृतियों के ये नाम हैं, बाह्य प्रवृत्ति के अंग-उपांग हैं। अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः। नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः॥९॥ और भी बहुत से शूरवीर अनेक शस्त्रों से युक्त मेरे लिये जीवन की आशा को त्यागकर युद्ध में डटे हैं। सभी मेरे लिये प्राण त्यागनेवाले हैं; किन्तु उनकी कोई ठोस गणना नहीं है। अब कौन-सी सेना किन भावों द्वारा सुरक्षित है? इस पर कहते हैं- अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्। पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्॥१०॥ भीष्म द्वारा रक्षित हमारी सेना सब प्रकार से अजेय है और भीम द्वारा रक्षित इन लोगों की सेना जीतने में सुगम है। 'पर्याप्त' और 'अपर्याप्त' जैसे श्लिष्ट शब्द का प्रयोग दुर्योधन की आशंका को व्यक्त करता है। अतः देखना