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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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द्वितीय अध्याय ४३ इसी एक सनातन आत्मिक पथ पर चलनेवाले साधकों को महापुरुष ने स्वभाव की क्षमता के अनुसार चार श्रेणियों में बाँटा- शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मण। साधना की प्रारम्भिक अवस्था में प्रत्येक साधक शूद्र अर्थात् अल्पज्ञ होता है। घण्टों भजन में बैठने पर वह दस मिनट भी अपने पक्ष में नहीं पाता। वह प्रकृति के मायाजाल को काट नहीं पाता। इस अवस्था में महापुरुष की सेवा से उसके स्वभाव में सद्गुण आते हैं। वह वैश्य श्रेणी का साधक बन जाता है। आत्मिक सम्पत्ति ही स्थिर सम्पत्ति है। इसका वह शनैः-शनैः संग्रह और गोपालन अर्थात् इन्द्रियों की सुरक्षा करने में सक्षम हो जाता है। काम, क्रोध इत्यादि से इन्द्रियों की हिंसा होती है तथा विवेक, वैराग्य से इनकी सुरक्षा होती है; किन्तु प्रकृति को निर्बीज करने की क्षमता उसमें नहीं होती। क्रमशः उन्नति करते-करते साधक के अन्तःकरण में तीनों गुणों को काटने की क्षमता अर्थात् क्षत्रियत्व आ जाता है। इसी स्तर पर प्रकृति और उसके विकारों को नाश करने की क्षमता आ जाती है, इसलिये युद्ध यहीं से आरम्भ होता है। क्रमशः साधन करके साधक ब्राह्मणत्व की श्रेणी में बदल जाता है। इस समय मन का शमन, इन्द्रियों का दमन, धारावाही चिन्तन, सरलता, अनुभव, ज्ञान इत्यादि लक्षण साधक में स्वाभाविक प्रवाहित होते हैं। इन्हीं के अनुष्ठान से चलकर क्रमशः वह ब्रह्म में प्रवेश पा जाता है, जहाँ वह ब्राह्मण भी नहीं रह जाता। विदेह राजा जनक की सभा में महर्षि याज्ञवल्क्य ने चाक्रायण, उषस्ति, कहोल, आरुणि, उद्दालक और गार्गी के प्रश्नों का समाधान करते हुए बताया कि आत्मसाक्षात्कार का पूर्णतया सम्पादन करनेवाला ही ब्राह्मण होता है। यह आत्मा ही लोक, परलोक और समस्त प्राणियों को भीतर से नियमित करता है। सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, तारागण, अन्तरिक्ष, आकाश एवं प्रत्येक क्षण इस आत्मा के ही प्रशासन में हैं। यह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। आत्मा अक्षर है, इससे भिन्न सब नाशवान् हैं। जो कोई इसी लोक में इस अक्षर को न जानकर हवन करता है, तप करता है, हजारों वर्षों तक यज्ञ करता है, उसका यह सब कर्म नाशवान् है। जो कोई भी इस अक्षर को जाने बिना इस लोक से मरकर जाता है वह दयनीय है, कृपण है और जो इस अक्षर

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