यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in context४४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता को जानकर इस लोक से मरकर जाता है वह ब्राह्मण है। (बृहदारण्यकोपनिषद्, तृतीय अध्याय, अष्टम ब्राह्मण) अर्जुन क्षत्रिय श्रेणी का साधक है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि क्षत्रिय श्रेणी के साधक के लिये युद्ध के अतिरिक्त कोई कल्याणकारी रास्ता है ही नहीं। प्रश्न उठता है कि क्षत्रिय है क्या? प्रायः लोग इसका आशय समाज में जन्मना उत्पन्न ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र जातियों से लेते हैं। इन्हें ही चार वर्ण मान लिया जाता है। किन्तु नहीं, शास्त्रकार ने स्वयं बताया है कि क्षत्रिय क्या है, वर्ण क्या है? यहाँ उन्होंने केवल क्षत्रिय का नाम लिया और आगे अठारहवें अध्याय तक इस प्रश्न का समाधान प्रस्तुत किया कि वस्तुतः ये वर्ण हैं क्या और कैसे इनमें परिवर्तन होता है? श्रीकृष्ण ने कहा, ‘चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टम्’ (गीता, ४/१३)- चार वर्णों की सृष्टि मैंने की। तो क्या मनुष्यों को बाँटा? श्रीकृष्ण कहते हैं- नहीं, ‘गुणकर्मविभागशः।’- गुणों के माध्यम से कर्म को चार भागों में बाँटा। अब यह देखना है कि वह कर्म क्या है, जिसे बाँटा गया? गुण परिवर्तनशील हैं। साधना की उचित प्रक्रिया द्वारा तामसी से राजसी और राजसी से सात्त्विक गुणों में प्रवेश मिलता जाता है। अन्ततः ब्राह्मण स्वभाव बन जाता है। उस समय ब्रह्म में प्रवेश दिला देनेवाली सारी योग्यताएँ उस साधक में रहती हैं। वर्ण-सम्बन्धी प्रश्न यहाँ से आरम्भ होकर अठारहवें अध्याय में जाकर पूर्ण होता है। श्रीकृष्ण की मान्यता है- ‘श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्व- नुष्ठितात्।’ (गीता, १८/४७) स्वभाव से उत्पन्न इस धर्म में प्रवृत्त होने की क्षमता जिस स्तर की हो, भले ही वह गुणरहित शूद्र श्रेणी की हो, तब भी परमकल्याण करती है; क्योंकि आप क्रमशः वहीं से उत्थान करते हैं। उससे ऊपरवालों की नकल करके साधक नष्ट हो जाता है। अर्जुन क्षत्रिय श्रेणी का साधक था, इसलिये श्रीकृष्ण कहते हैं कि- अर्जुन! अपने स्वभाव से उत्पन्न इस युद्ध में प्रवृत्त होने की अपनी क्षमता को देखकर भी तू भय करने योग्य नहीं है। इससे बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कार्य क्षत्रिय के लिये नहीं है। इसी पर प्रकाश डालते हुए पुनः योगेश्वर कहते हैं-