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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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द्वितीय अध्याय ४९ देता है। धर्म परिवर्तित नहीं होता। आप इस कर्म को समझें और इस पर दो कदम चल भर दें (जो सद्गृहस्थ आश्रम में रहकर ही चला जा सकता है, साधक तो चलते ही हैं।), बीज भर डाल दें, तो अर्जुन ! बीज का नाश नहीं होता। प्रकृति में कोई क्षमता नहीं, ऐसा कोई अस्त्र नहीं कि उस सत्य को मिटा दे। प्रकृति केवल आवरण डाल सकती है, कुछ देर कर सकती है; किन्तु साधन के आरम्भ को मिटा नहीं सकती। आगे श्रीकृष्ण ने बताया कि सभी पापियों से भी बड़ा पापी ही क्यों न हो, ज्ञानरूपी नौका द्वारा निःसन्देह पार हो जायेगा। ठीक उसी बात को यहाँ कहते हैं कि- अर्जुन ! निष्काम कर्मयोग का बीजारोपण भर कर दें तो उस बीज का कभी नाश नहीं होता। विपरीत फलरूपी दोष भी इसमें नहीं होता कि आपको स्वर्ग, ऋद्धियों या सिद्धियों तक पहुँचा कर छोड़ दे। आप यह साधन भले छोड़ दें; किन्तु यह साधन आपका उद्धार करके ही छोड़ेगा। इस निष्काम कर्मयोग का थोड़ा-सा भी साधन जन्म-मृत्यु के महान् भय से उद्धार कर देता है। 'अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्।' (गीता, ६/४५) कर्म का यह बीजारोपण अनेक जन्मों के पश्चात् वहीं खड़ा कर देगा, जहाँ परमधाम है, परमगति है। इसी क्रम में आगे कहते हैं- व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन। बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्।।४१।। अर्जुन ! इस निष्काम कर्मयोग में क्रियात्मिका बुद्धि एक ही है। क्रिया एक है और परिणाम एक ही है। आत्मिक सम्पत्ति ही स्थिर सम्पत्ति है। इस सम्पत्ति को प्रकृति के द्वन्द्व से शनैः-शनैः अर्जित करना व्यवसाय है। यह व्यवसाय अथवा निश्चयात्मक क्रिया भी एक ही है। तब तो जो लोग बहुत- सी क्रियाएँ बताते हैं, क्या वे भजन नहीं करते? श्रीकृष्ण कहते हैं- "हाँ, वे भजन नहीं करते। उन पुरुषों की बुद्धि अनन्त शाखाओंवाली होती है, इसलिये अनन्त क्रियाओं का विस्तार कर लेते हैं।" यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः। वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः।।४२।।