यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in context५० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्। क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति।।४३।। पार्थ! वे ‘कामात्मानः’- कामनाओं से युक्त, ‘वेदवादरताः’- वेद के वाक्यों में अनुरक्त, ‘स्वर्गपराः’- स्वर्ग को ही परम लक्ष्य मानते हैं कि इससे आगे कुछ है ही नहीं-ऐसा कहनेवाले अविवेकीजन जन्म-मृत्युरूपी फल देनेवाली एवं भोग और ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिये बहुत-सी क्रियाओं का विस्तार कर लेते हैं और दिखावटी शोभायुक्त वाणी में व्यक्त भी करते हैं। अर्थात् अविवेकियों की बुद्धि अनन्त भेदोंवाली होती है। वे फलवाले वाक्य में ही अनुरक्त रहते हैं, वेद के वाक्यों को ही प्रमाण मानते हैं, स्वर्ग को ही श्रेष्ठ मानते हैं। उनकी बुद्धि बहुत-सी भेदोंवाली है, इसलिये अनन्त क्रियाओं की रचना कर लेते हैं। वे नाम तो परमतत्त्व परमात्मा का ही लेते हैं; किन्तु उसकी ओट में अनन्त क्रियाओं का विस्तार कर लेते हैं। तो क्या अनन्त क्रियाएँ कर्म नहीं हैं? श्रीकृष्ण कहते हैं- नहीं, अनन्त क्रियाएँ कर्म नहीं हैं। तो वह एक निश्चित क्रिया है क्या? श्रीकृष्ण अभी यह नहीं बताते। अभी तो केवल इतना कहते हैं कि अविवेकियों की बुद्धि अनन्त शाखाओंवाली होती है, इसलिये वे अनन्त क्रियाओं का विस्तार कर लेते हैं। वे केवल विस्तार ही नहीं करते अपितु आलंकारिक शैली में उसे व्यक्त भी करते हैं। उसका प्रभाव क्या होता है?- भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्। व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते।।४४।। उनकी वाणी की छाप जिन-जिन के चित्त पर पड़ जाती है, अर्जुन! उनकी भी बुद्धि नष्ट हो जाती है, न कि वे कुछ पाते हैं। उस वाणी द्वारा हरे हुए चित्तवालों के और भोग-ऐश्वर्य में आसक्तिवाले पुरुषों के अन्तःकरण में क्रियात्मिका बुद्धि नहीं रह जाती। इष्ट में समाधिस्थ करनेवाली निश्चयात्मक क्रिया उनमें नहीं होती। ऐसे अविवेकियों की वाणी सुनता कौन है? भोग और ऐश्वर्य में आसक्तिवाले ही सुनते हैं, अधिकारी नहीं सुनता। ऐसे पुरुषों में सम और