१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंमन्त्र ३ ११ भगवान्यच्च कृत्स्नं तस्मै वै नमो नमः ॥ ३० ॥ यो वै रुद्रः स भगवान्यच्च सत्यं तस्मै वै नमो नमः ॥ ३१ ॥ यो वै रुद्रः स भगवान्यच्च सर्वं तस्मै वै नमो नमः ॥ ३२ ॥ ॥ २ ॥ हे भगवान् रुद्र ! आप ब्रह्मा स्वरूप हैं, आपको नमन है। हे भगवान् रुद्र ! आप विष्णु स्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। हे भगवान् रुद्र ! आप स्कन्द रूप हैं, आपको नमन है। आप इन्द्र स्वरूप, अग्नि स्वरूप, वायु स्वरूप और सूर्य स्वरूप हैं, आपको नमन है। हे भगवान् रुद्र ! आप सोम स्वरूप हैं, अष्टग्रह स्वरूप, प्रतिग्रह स्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। आप भूः स्वरूप, भुवः स्वरूप, स्वः स्वरूप और महः स्वरूप हैं, आपको नमन है। हे रुद्र भगवान्! आप पृथ्वी, अन्तरिक्ष, द्यौ, आपः और आकाश रूप हैं, आपको नमस्कार है। हे रुद्र भगवान् ! आप विश्वरूप, स्थूलरूप, सूक्ष्मरूप, कृष्ण और शुक्ल स्वरूप हैं, आपको नमन है। आप सत्यरूप और सर्वरूप हैं, आपको बारम्बार नमन है॥ २॥ भूस्ते आदिर्मध्यं भुवस्ते स्वस्ते शीर्षं विश्वरूपोऽसि ब्रह्मैकस्त्वं द्विधा त्रिधा बद्धस्त्वं शान्तिस्त्वं पुष्टिस्त्वं हुतमहुतं दत्तमदत्तं सर्वमसर्वं विश्वमविश्वं कृतमकृतं परमपरं परायणं च त्वम्। अपाम सोमममृता अभूमागन्म ज्योतिरविदाम देवान्। किं नूनमस्मान्कृणवदरातिः किमु धूर्तिरमृत मर्त्यस्य च। हे रुद्र भगवान्! भूः, भुवः और स्वः लोक क्रमशः आपके नीचे, मध्य और शीर्ष के लोक हैं। आप विश्वरूप हैं और एक मात्र ब्रह्म हैं; किन्तु भ्रमवश दो और तीन संख्या वाले प्रतीत होते हैं। आप वृद्धि स्वरूप, शान्तिस्वरूप, पुष्टिरूप, हुत-अहुतरूप, दत्तरूप-अदत्तरूप,सर्वरूप-असर्वरूप, विश्व-अविश्वरूप, कृतरूप- अकृतरूप, पर-अपररूप और परायणरूप हैं। आपने हमें (देवों को) अमृत स्वरूप सोमपान कराकर अमृतत्व प्रदान किया है। हम ज्योति स्वरूप होकर ज्ञान को प्राप्त हुए हैं। अब कामादि शत्रु हमें क्षति नहीं पहुँचा सकते। आप मर्त्यो (मनुष्यों) के लिए अमृत तुल्य हैं। [सोम स्थूल ही नहीं, सूक्ष्म दिव्य ज्ञान रूप भी है। सोम रूप ज्ञान को आत्मसात् करके साधक स्वयं ज्योतित हो जाता है। तब दिव्य ज्ञान के साथ स्वाभाविक रूप से योग होता है और कामादि विकार प्रभावी नहीं हो पाते।] सोमसूर्यं पुरस्तात् सूक्ष्मः पुरुषः। सर्वं जगद्धितं वा एतदक्षरं प्राजापत्यं सौम्यं सूक्ष्मं पुरुषमग्राह्यमग्राह्येण भावं भावेन सौम्यं सौम्येन सूक्ष्मं सूक्ष्मेण वायव्यं वायव्येन ग्रसति स्वेन तेजसा तस्मा उपसंहर्त्रे महाग्रासाय वै नमो नमः। हृदिस्था देवताः सर्वा हृदि प्राणाः प्रतिष्ठिताः। हे देव ! आप सोम (चन्द्र) और सूर्य से भी पूर्व उत्पन्न सूक्ष्म पुरुष हैं। आप सम्पूर्ण जगत् का हित करने वाले, अक्षर रूप, प्राजापत्य (प्रजापतियों द्वारा स्तुत्य), सूक्ष्म, सौम्य पुरुष हैं, जो अपने तेज से अग्राह्य को अग्राह्य से, भाव को भाव से, सौम्य को सौम्य से, सूक्ष्म को सूक्ष्म से, वायु को वायु से ग्रस लेते हैं, ऐसे महाग्रास करने वाले आप (रुद्र भगवान्) को नमस्कार है। सभी हृदयों में देवगण, प्राण और आप विराजते हैं। [मनुष्य के अन्तस् में जीवन ऊर्जारूप प्राणों, दिव्य संवेदना रूप देवगणों तथा आत्म चेतन रूप में परमात्मा का आवास ऋषि अनुभव करते हैं। उन्हें उनसे सम्बन्धित अनुशासनों के माध्यम से सक्रिय एवं फलित किया जा सकता है।] हृदि त्वमसि यो नित्यं तिस्रो मात्राः परस्तु सः। तस्योत्तरतः शिरो दक्षिणतः पादौ य उत्तरतः स ओङ्कारः य ओङ्कारः स प्रणवो यः प्रणवः स सर्वव्यापी यः सर्वव्यापी सोऽनन्तो योऽनन्तस्तत्तारं यत्तारं तत्सूक्ष्मं यत्सूक्ष्मं तच्छुक्लं यच्छुक्लं तद्वैद्युतं यद्वैद्युतं तत्परं ब्रह्म यत्परं ब्रह्म स एकः य एकः स रुद्रो यो रुद्रः स ईशानो य ईशानः स भगवान महेश्वरः ॥ ३ ॥