भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 13, कुल 414 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 13

मन्त्र ४ १३ जाता है। इसका नाम अनन्त इसलिए है कि इस 'शब्द' का उच्चारण करते हुए ऊपर-नीचे और तिरछे कहीं भी इसका अन्त प्रतीत नहीं होता। 'तारक' नाम इसलिए दिया गया है कि यह गर्भ, जन्म, व्याधि, वृद्धावस्था और मरण से युक्त संसार के भय से तारने वाला है। इसका नाम 'शुक्ल' इसलिए है कि यह स्व प्रकाशित है, अन्यों के लिए प्रकाशक है। इसे 'सूक्ष्म' इस कारण कहा जाता है कि इसका उच्चारण करने पर यह सूक्ष्म स्वरूप होकर स्थावर आदि सभी शरीरों में अधिष्ठित होता है। इसे 'वैद्युत' कहने का कारण यह है कि इसका उच्चारण करने से घोर अन्धकार (अज्ञान) की स्थिति में भी समग्र काया (स्थूल, सूक्ष्म, कारण आदि) विशेष रूप से द्युतिमान् हो जाती है। परब्रह्म कहने का कारण यह है कि वह पर, अपर और परायण (इन तीनों) बृहत् (व्यापक घटकों) को बृहत्या (विशालता के माध्यम से) व्यापक बनाता है। [ ऋषि द्वारा परमात्म-सत्ता को परब्रह्म कहने का तात्पर्य प्रकट किया गया है- पर+ब्रह्म के संयोग से परब्रह्म बना है। जो पर (अव्यक्त) है तथा जो अपर (व्यक्त) है, वे एक दूसरे के परायण-एक दूसरे के प्रति जागरूक-परस्पर पूरक हैं। इस भाव को प्रथम पद 'पर' से प्रकट किया गया है। जो बृहत्-विशाल है तथा विशालता (संकीर्णता से मुक्तभाव) से सभी घटकों को व्यापकता प्रदान करता है, उसके लिए दूसरा पद 'ब्रह्म' प्रयुक्त किया गया है।] इसे (ब्रह्म को) एक इसलिए कहा जाता है कि यह समस्त प्राणों का भक्षण करके 'अज' स्वरूप होकर उत्पत्ति और संहार करता है। समस्त तीर्थों में वह 'एक' ही (तत्त्व) विद्यमान है। अनेक लोग पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण के विभिन्न तीर्थों में परिभ्रमण करते हैं। वहाँ भी उनकी सद्गति का कारण वह एक ही (तत्त्व) है। समस्त प्राणियों में एक रूप में निवास करने के कारण उस तत्त्व को 'एक' कहते हैं। 'रुद्र' इसलिए कहा जाता है कि इसके स्वरूप का ज्ञान ऋषियों को सहज ही हो सकता है। सामान्य जनों को इसका ज्ञान हो सकना कठिन है। 'ईशान' क्यों कहते हैं, इसलिए कि वह समस्त देवों और उनकी शक्तियों पर अपना प्रभुत्व (ईशत्व) रखता है। (सो हे रुद्र!) आप शूर की हम उसी प्रकार स्तुति करते हैं, जिस प्रकार दुग्ध प्राप्त करने के लिए गौ को प्रसन्न किया जाता है। ( हे रुद्र!) आप ही इन्द्र रूप होकर स्थावर-जंगम संसार के ईश और दिव्य दृष्टि सम्पन्न हैं, इसी कारण आपको 'ईशान' नाम से सम्बोधित किया जाता है। आपको भगवान् महेश्वर क्यों कहते हैं? इसलिए कि जो भक्तजन ज्ञान पाने के लिए आपका भजन करते हैं और आप उन पर कृपा-वर्षण करते हैं, वाक् शक्ति का प्रादुर्भाव करते हैं, साथ ही समस्त भावों का परित्याग करके आत्मज्ञान और योग के ऐश्वर्य से अपनी महिमा में स्थित रहते हैं, इसीलिए आपको 'महेश्वर' कहा जाता है। इस प्रकार इस रुद्र के चरित का वर्णन हुआ ॥ ४ ॥ एषो ह देवः प्रदिशो नु सर्वाःपूर्वो ह जातः स उ गर्भे अन्तः। स एव जातः स जनिष्यमाणः प्रत्यङ्जनास्तिष्ठति सर्वतोमुखः। एको रुद्रो न द्वितीयाय तस्मै य इमाँल्लोकानीशत ईशनीभिः। प्रत्यङ्जनास्तिष्ठति संचुकोचान्तकाले संसृज्य विश्वा भुवनानि गोप्ता। यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येको येनेदं संचरति विचरति सर्वम्। तमीशानं वरदं देवमीड्यं निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति। क्ष्मां हित्वा हेतुजालस्य मूलं बुद्ध्या संचितं स्थापयित्वा तु रुद्रे रुद्रमेकत्वमाहुः। शाश्वतं वै पुराणमिषमूर्जेन पशवोऽनुनामयन्तं मृत्युपाशान्। तदेतेनात्मनेतेनार्ध- चतुर्थमात्रेण शान्तिं संसृजति पाशविमोक्षणम्। या सा प्रथमा मात्रा ब्रह्मदेवत्या रक्ता वर्णेन यस्तां ध्यायते नित्यं स गच्छेद्ब्राह्मं पदम्। या सा द्वितीया मात्रा विष्णुदेवत्या कृष्णा वर्णेन यस्तां ध्यायते नित्यं स गच्छेद्वैष्णवं पदम्। या सा तृतीया मात्रा ईशानदेवत्या कपिला वर्णेन यस्तां ध्यायते नित्यं स गच्छेदैशानं पदम्। या साऽर्धचतुर्थी मात्रा सर्वदेवत्याऽव्यक्तीभूता खं