१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 224, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ें२३२ मण्डलब्राह्मणोपनिषद् ॥ तृतीयः खण्डः ॥ तद्योगं च द्विधा विद्धि पूर्वोत्तरविभागतः । पूर्वं तु तारकं विद्यादमनस्कं तदुत्तरमिति। तारकं द्विविधम् मूर्त्तितारकममूर्त्तितारकमिति। यदिन्द्रियान्तं तन्मूर्त्तितारकम्। यद्भ्रूयुगातीतं तदमूर्त्तितारकमिति ॥ १ ॥ उस योग के दो विभाग हैं। एक पूर्व तथा दूसरा उत्तर। पूर्व विभाग को तारक ब्रह्म कहते हैं और उत्तर विभाग को अमनस्क कहते हैं। तारक ब्रह्म के भी दो प्रकार हैं-एक मूर्त्तितारक और दूसरा अमूर्ति तारक। जो इन्द्रियों तक सीमित है, वह मूर्त्तितारक है, जो दोनों भौंहों से परे- आगे है, वह अमूर्त्तितारक है ॥ १ ॥ उभयमपि मनोयुक्तमभ्यसेत् । मनोयुक्तान्तरदृष्टिस्तारकप्रकाशाय भवति ॥ २ ॥ इन दोनों (मूर्त्तितारक और अमूर्त्तितारक) का मनयुक्त (मनोयोग पूर्वक) होकर अभ्यास करना चाहिए; क्योंकि मनयुक्त अन्तर्दृष्टि तारक ब्रह्म को प्रकट करने में सक्षम होती है ॥ २ ॥ भ्रूयुगमध्यबिले तेजस आविर्भावः। एतत्पूर्वतारकम् ॥ ३ ॥ इसके बाद भ्रूयुगल के मध्य स्थित छिद्र में तेज आविर्भूत होता है। यह पूर्व तारक ब्रह्म है ॥ ३ ॥ उत्तरं त्वमनस्कम्। तालुमूलोर्ध्वभागे महज्ज्योतिर्विद्यते । तद्दर्शनादणिमादिसिद्धिः ॥ ४ ॥ उत्तर विभाग तो अमनस्क (मनरहित) होता है। तालुमूल के ऊर्ध्व भाग में महाज्योति का निवास होता है। उसके दर्शन से अणिमा आदि सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं ॥ ४ ॥ लक्ष्येऽन्तर्बाह्यायां दृष्टौ निमेषोन्मेषवर्जितायां चेयं शाम्भवी मुद्रा भवति। सर्वतन्त्रेषु गोप्यमहाविद्या भवति । तज्ज्ञानेन संसारनिवृत्तिः। तत्पूजनं मोक्षफलदम् ॥ ५ ॥ जब लक्ष्य में अन्तः-बाह्य दृष्टि निर्निमेष (स्थिर) हो जाती है, तो यह शाम्भवी मुद्रा होती है। समस्त तन्त्रों में गोपनीय यह ब्रह्म विद्या है। उसके ज्ञान से संसार से निवृत्ति हो जाती है, उसका पूजन मोक्षरूपी फल प्रदान करता है ॥ ५ ॥ अन्तर्लक्ष्यं जलज्ज्योतिःस्वरूपं भवति । महर्षिवेद्यं अन्तर्बाह्येन्द्रियैरदृश्यम् ॥ ६ ॥ अन्तर्लक्ष्य दीप्तिमान् ज्योति के समान है, इसे महर्षिगण ही जान सकते हैं। यह बाह्य और आन्तरिक इन्द्रियों (नेत्रों-मन आदि) के द्वारा अगोचर है ॥ ६ ॥ ॥ चतुर्थः खण्डः ॥ सहस्रारे जलज्ज्योतिरन्तर्लक्ष्यम्। बुद्धिगुहायां सर्वाङ्गसुन्दरं पुरुषरूपमन्तर्लक्ष्यमित्यपरे । शीर्षान्तर्गतमण्डलमध्यगं पञ्चवक्त्रमुमासहायं नीलकण्ठं प्रशान्तमन्तर्लक्ष्यमिति केचित् । अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तर्लक्ष्यमित्येके ॥ १ ॥ सहस्रार दल में दीप्तिमान् ज्योति के समान अन्तर्लक्ष्य है। कुछ अन्य लोग ऐसा मानते हैं कि बुद्धि रूपी गुहा में सर्वाङ्ग सुन्दर पुरुष का रूप अन्तर्लक्ष्य है। कितने ही ऐसा मानते हैं कि शीर्ष के अन्तर्गत स्थित मण्डल के मध्य पाँच मुख वाले और उमा सहित नीलकण्ठ भगवान् शंकर का प्रशान्त रूप भी अन्तर्लक्ष्य है। अङ्गुष्ठ मात्र पुरुष ही अन्तर्लक्ष्य है, ऐसा भी कितने ही विद्वान् मानते हैं ॥ १ ॥