१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ४ खण्ड १ मन्त्र २ २३९ ततः शुष्कवृक्षवन्मूर्च्छानिद्रामयनिःश्वासोच्छ्वासाभावात्रष्टद्वन्द्वः सदाऽचञ्चलगात्रः परमशान्तिं स्वीकृत्य मनःप्रचारशून्यं परमात्मनि लीनं भवति ॥ ४ ॥ तत्पश्चात् शुष्क वृक्षवत् मूर्च्छा और निद्रा की स्थिति में श्वासोच्छ्वास के अभाव में सुख-दुःख आदि द्वन्द्व विनष्ट हो जाते हैं और शरीर अचञ्चल हो जाता है। ऐसी स्थिति का व्यक्ति परम शान्ति को स्वीकार कर लेता है, जिससे मन प्रचार-शून्य बन जाता है तथा परमात्मा में लीन हो जाता है ॥ ४ ॥ पयःस्रावानन्तरं धेनुस्तनक्षीरमिव सर्वेन्द्रियवर्गे परिनष्टे मनोनाशो भवति तदेवामनस्कम् ॥ ५ ॥ जिस प्रकार दुग्ध दोहन कर लेने के उपरान्त वह गाय के स्तनों में नहीं रहता, उसी प्रकार समस्त इन्द्रिय वर्ग के विनष्ट हो जाने पर मन का भी विनाश हो जाता है—यही अमनस्क स्थिति है ॥ ५ ॥ तदनु नित्यशुद्धः परमात्माहमेवेति तत्त्वमसीत्युपदेशेन त्वमेवाहमहमेव त्वमिति तारकयोगमार्गेणाखण्डानन्दपूर्णः कृतार्थो भवति ॥ ६ ॥ इसके उपरान्त 'मैं ही नित्य शुद्ध परमात्मा हूँ' इस प्रकार 'तत्त्वमसि' उपदेश प्राप्त हो जाने से 'तुम ही मैं हूँ', 'मैं ही तुम हो' इस तारक योग मार्ग से अखण्डानन्द पाकर (साधक) पूर्णरूपेण कृतकृत्य हो जाता है ॥६ ॥ द्वितीयः खण्डः ॥ परिपूर्णपराकाशमग्नमनाः प्राप्तोन्मन्यवस्थः संन्यस्तसर्वेन्द्रियवर्गोऽनेकजन्मार्जितपुण्यपु- ञ्जपक्व कैवल्यफलोऽखण्डानन्दनिरस्तसर्वक्लेशकश्मलो ब्रह्माहमस्मीति कृतकृत्यो भवति ॥१ जिसका मन परमाकाश में पूर्णरूपेण मग्न हो गया हो, जिसे उन्मनी अवस्था प्राप्त हो गई हो एवं जो समस्त इन्द्रिय वर्ग से वियुक्त हो गया हो, अनेक जन्मों से प्राप्त हुए पुण्यपुञ्ज द्वारा उसका कैवल्य स्वरूप फल परिपक्व हो जाता है। अखण्डानन्द प्राप्त कर लेने से उसके समस्त क्लेश रूप पाप विनष्ट हो जाते हैं। तदुपरान्त 'मैं ब्रह्म हूँ' इस भाव से वह निरन्तर अभिभूत रहता हुआ कृतकृत्य हो जाता है ॥ १ ॥ त्वमेवाहं न भेदोऽस्ति पूर्णत्वात्परमात्मनः । इत्युच्चरन्समालिङ्ग्य शिष्यं ज्ञप्तममीनयत् ॥ २ ॥ परमात्मा पूर्ण है, इसलिए 'तू ही मैं हूँ' ऐसा उच्चारण करते हुए गुरु (मण्डल पुरुष) ने शिष्य (याज्ञवल्क्य) का आलिङ्गन (भेंट) करते हुए उसे इस ज्ञान का उपदेश किया था ॥ २ ॥ ॥ चतुर्थ ब्राह्मणम् ॥ ॥ प्रथमः खण्डः ॥ अथ ह याज्ञवल्क्यो मण्डलपुरुषं पप्रच्छ व्योमपञ्चकलक्षणं विस्तरेणानुब्रूहीति ॥१ ॥ इसके बाद ऋषि याज्ञवल्क्य ने मण्डल पुरुष (सूर्यमण्डल स्थित पुरुष) से प्रश्न किया कि अब आप मुझे 'आकाश पञ्चक' का लक्षण सविस्तार बताएँ ॥ १ ॥ स होवाचाकाशं पराकाशं महाकाशं । सूर्याकाशं परमाकाशमिति पञ्च भवन्ति ॥ २ ॥ उन्होंने कहा कि आकाश के पाँच प्रकार हैं-आकाश, पराकाश, महाकाश, सूर्याकाश और परमाकाश ॥२ ॥