भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

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अध्याय २ मन्त्र २१ २४९ अद्वैतभावना भैक्षमभक्ष्यं द्वैतभावनम्। गुरुशास्त्रोक्तभावेन भिक्षोर्भैक्षं विधीयते ॥१०॥ अद्वैत की भावना ही वास्तव में सच्ची भिक्षावृत्ति है एवं द्वैत की भावना ही अभक्ष्य वस्तु है। भिक्षुक को गुरु तथा शास्त्र के आदेशानुसार भिक्षा माँगनी चाहिए॥ १०॥ विद्वान्स्वदेशमुत्सृज्य संन्यासानन्तरं स्वतः। कारागारविनिर्मुक्तचोरवद्दूरतो वसेत् ॥११॥ जिस तरह से चोर कैदखाने से छूटकर दूर जाकर निवास करता है, वैसे ही ज्ञानी पुरुष को संन्यास ग्रहण कर अपने देश से दूर निवास के लिए चले जाना चाहिए॥ ११॥ अहंकारसुतं वित्तभ्रातरं मोहमन्दिरम्। आशापत्नीं त्यजेद्यावत्तावान्मुक्तो न संशयः ॥१२॥ अहंकार रूपी पुत्र का, वित्त (धन) रूपी भाई का, मोहरूपी घर का तथा आशा रूपी पत्नी का परित्याग कर देने वाला शीघ्र ही मुक्त हो जाता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है॥ १२॥ मृता मोहमयी माता जातो बोधमयः सुतः। सूतकद्वयसंप्राप्तौ कथं संध्यामुपास्महे ॥१३॥ मोहरूपी माँ मृत्यु को प्राप्त हो गयी और ज्ञानरूपी पुत्र उत्पन्न हो गया है, इस कारण मरण और जन्म के दो सूतक लगे हुए हैं, तो फिर सन्ध्या-वन्दन आदि कार्य किस प्रकार किये जा सकते हैं?॥ १३॥ हृदाकाशे चिदादित्यः सदा भासति भासति। नास्तमेति न चोदेति कथं संध्यामुपास्महे ॥१४॥ हृदयरूपी आकाश में चैतन्य रूप सूर्य सदैव प्रकाशित रहता है और फिर वह न अस्त होता है न उदय ही। तब फिर सन्ध्या किस प्रकार (कब) करे?॥ १४॥ एकमेवाद्वितीयं यद्गुरोर्वाक्येन निश्चितम्। एतदेकान्तमित्युक्तं न मठो न वनान्तरम् ॥१५॥ यहाँ पर सभी कुछ एक ही है, दूसरा कुछ भी नहीं है, ऐसा गुरु के उपदेश द्वारा निश्चय हो गया है। यह भावना ही एकान्त स्वरूप है, मठ अथवा वन का मध्य भाग एकान्त नहीं है॥ १५॥ असंशयवतां मुक्तिः संशयाविष्टचेतसाम्। न मुक्तिर्जन्मजन्मान्ते तस्माद्विश्वासमाप्नुयात्। ॥१६॥ जो मनुष्य संशयरहित हैं,वे ही मुक्ति को प्राप्त कर सकते हैं तथा जिन लोगों को संशय है,वे अनेक जन्मों के अन्त में भी मुक्त नहीं हो सकते। इसलिए गुरु एवं शास्त्र के वचनों पर पूर्ण विश्वास रखना चाहिए॥ कर्मत्यागान्न संन्यासो न प्रैषोच्चारणेन तु। संधौ जीवात्मनोरैक्यं संन्यासः परिकीर्तितः ॥१७॥ कर्मों को छोड़ देना ही संन्यास नहीं है। इसी प्रकार 'मैं संन्यासी हूँ' ऐसा कह देने से भी कोई संन्यासी नहीं हो सकता। समाधि अवस्था में जीव-परमात्मा की एकता का भान होना ही संन्यास कहा जाता है॥ १७॥ वमनाहारवद्यस्य भाति सर्वेषणादिषु। तस्याधिकारः संन्यासे त्यक्तदेहाभिमानिनः ॥१८॥ जिस मनुष्य को समस्त एषणाएँ-इच्छायें वमन किये हुए (उगले हुए) आहार के समान लगती हैं और जिसने शरीर की ममता त्याग दी है, उसको संन्यास का अधिकार है॥ १८॥ यदा मनसि वैराग्यं जातं सर्वेषु वस्तुषु। तदैव संन्यसेद्विद्वानन्यथा पतितो भवेत् ॥१९॥ जब सभी वस्तुओं से मन में वैराग्य उत्पन्न हो जाए, तभी विद्वान् मनुष्य को संन्यास-धर्म ग्रहण करना चाहिए, अन्यथा उसका अवश्य ही पतन हो जाता है॥ १९॥ द्रव्यार्थमन्नवस्त्रार्थं यः प्रतिष्ठार्थमेव वा। संन्यसेदुभयभ्रष्टः स मुक्तिं नाप्तुमर्हति ॥२०॥ जो मनुष्य द्रव्य (धन) के, अन्न के, वस्त्रों के अथवा ख्याति के लोभ में संन्यास-धर्म ग्रहण कर लेता है, वह दोनों ओर से भ्रष्ट हुआ, कभी भी मुक्ति को प्राप्त नहीं कर सकता॥ २०॥ उत्तमा तत्त्वचिन्तैव मध्यमं शास्त्रचिन्तनम्। अधमा मन्त्रचिन्ता च तीर्थभ्रान्त्यधमाधमा ॥२१॥