भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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॥ अवधूतोपनिषद् ॥ यह उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेदीय है। इस उपनिषद् में सांकृति की जिज्ञासा का समाधान करते हुए भगवान् दत्तात्रेय अवधूत स्थिति के स्वरूप और महत्ता का वर्णन करते हैं। अवधूत स्थिति में किस प्रकार श्रेष्ठ तत्त्व के समाहित होने से व्यक्ति धन्य हो जाता है, इसका वर्णन भी किया गया है। ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ हे परमात्मन् ! आप हम दोनों (गुरु-शिष्य) की साथ-साथ रक्षा करें। हम दोनों का साथ-साथ पालन करें। हम दोनों साथ-साथ शक्ति अर्जित करें। हम दोनों की पढ़ी हुई विद्या तेजस्वी (प्रखर) हो। हम दोनों एक दूसरे के प्रति कभी ईर्ष्या-द्वेष न करें। हे शक्ति सम्पन्न ! (हमारे) त्रिविध (आधिभौतिक, आधिदैविक, आध्यात्मिक) तापों का शमन हो, अक्षय शान्ति की प्राप्ति हो। अथ ह सांकृतिर्भगवन्तमवधूतं दत्तात्रेयं परिसमेत्य पप्रच्छ। भगवन्कोऽवधूतस्तस्य का स्थितिः किं लक्ष्म किं संसरणमिति। तं होवाच भगवो दत्तात्रेयः परमकारुणिकः ॥१॥ अक्षरत्वाद्धरेण्यत्वाद्वधूतसंसारबन्धनात्। तत्त्वमस्यादिलक्ष्यत्वादवधूत इतीर्यते ॥ २ ॥ सांकृति ने भगवान् दत्तात्रेयजी के समीप जाकर पूछा- 'हे भगवन्! अवधूत कौन है? उसकी स्थिति किस तरह की होती है ? उसका लक्षण किस प्रकार का होता है ? तथा उसका संसार (सांसारिक व्यवहार) किस प्रकार का होता है?' उनके इन प्रश्नों को सुनकर परम कृपालु भगवान् दत्तात्रेयजी ने कहा- जो अक्षर - अर्थात् अविनाशी (भावयुक्त) हो, वरण करने योग्य हो, संसार रूपी बन्धनों से रहित हो तथा 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों के लक्ष्यार्थ बोध से युक्त हो, उसे ही अवधूत (अक्षर का 'अ', वरेण्य का 'व', धूतसंसारबन्धन का 'धू' तथा तत्त्वमस्यादि लक्ष्य का 'त' लेने से 'अवधूत') कहा जाता है ॥ १-२ ॥ यो विलङ्घ्याश्रमान्वर्णानात्मन्येव स्थितः सदा । अतिवर्णाश्रमी योगी अवधूतः स कथ्यते ॥ ३ ॥ जो योगी पुरुष आश्रम एवं वर्ण व्यवस्था से ऊपर उठकर आत्मा में ही सदैव स्थित रहता हो, वह वर्णाश्रम रहित योगी पुरुष 'अवधूत' कहा जाता है ॥ ३ ॥ तस्य प्रियं शिरः कृत्वा मोदो दक्षिणपक्षतः । प्रमोद उत्तरः पक्ष आनन्दो गोष्पदायते ॥४॥ उस (योगी) का प्रिय (ब्रह्म) ही सिर है, 'मोद' दायाँ बाजू और 'प्रमोद' बायाँ बाजू है तथा 'आनन्द' मध्य आत्मा है। उसकी (आत्मा की) स्थिति गाय के पैर के सदृश (चार-प्रिय, मोद, प्रमोद एवं आनन्द रूप) हो जाती है ॥ ४ ॥ [ यही प्रकरण तैत्तिरीयोपनिषद् ( २.५ ) में भी आया है । ]