१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंमन्त्र ८६ २६५ इस प्रकार के अभ्यास द्वारा जैसे-जैसे योगी को चित्त-शक्ति बढ़ती है, वैसे-वैसे ही उसको दूर-श्रवण, दूर-दर्शन, क्षण भर में सुदूर क्षेत्र से आ जाना, वाणी की सिद्धि, जब चाहे जैसा रूप ग्रहण कर लेना, अदृश्य हो जाना, उसके मल-मूत्र के स्पर्श से लोहे का स्वर्ण में परिवर्तन हो जाना, आकाश मार्ग से गमन कर सकना आदि सिद्धियाँ प्रकट होने लगती हैं। बुद्धिमान् श्रेष्ठ योगी सदैव योग की सिद्धि की ओर ही ध्यान बनाये रखे॥ एते विघ्ना महासिद्धेर्न रमेत्तेषु बुद्धिमान् । न दर्शयेत्स्वसामर्थ्यं यस्य कस्यापि योगिराट् ॥ ७६ (परन्तु) ये सभी सिद्धियाँ योग-सिद्धि के लिए विघ्नरूप हैं, बुद्धिमान् योगी साधक को इन (सिद्धियों) से बचना चाहिए। अपनी इस तरह की सामर्थ्य को कभी भी किसी के समक्ष प्रकट नहीं करना चाहिए॥ ७६ यथा मूढो यथा मूर्खो यथा बधिर एव वा । तथा वर्तेत लोकस्य स्वसामर्थ्यस्य गुप्तये ॥ ७७ ॥ इसलिए श्रेष्ठ योगी को जन सामान्य के समक्ष अज्ञानी, मूर्ख एवं बधिर की भाँति बनकर रहना चाहिए। अपनी सामर्थ्य को सभी तरह से छिपाकर गुप्त रीति से रहना चाहिए॥ ७७ ॥ शिष्याश्च स्वस्वकार्येषु प्रार्थयन्ति न संशयः । तत्तत्कर्मकरव्यग्रः स्वाभ्यासेऽविस्मृतो भवेत् ॥ शिष्य-समुदाय अपने-अपने कार्यों के लिए योगी साधक से निश्चित ही प्रार्थना करेंगे; किन्तु योगी को उन (शिष्यगणों) के काम में पड़कर अपने कर्त्तव्य (अभ्यास) को विस्मृत नहीं कर देना चाहिए॥ ७८ ॥ सर्वव्यापारमुत्सृज्य योगनिष्ठो भवेद्यतिः । अविस्मृत्य गुरोर्वाक्यमभ्यसेत्तदहर्निशम् ॥ ७९ ॥ उस योगी को चाहिए कि गुरु के वाक्यों को याद करके सभी तरह के क्रिया-कलापों को छोड़कर योग के अभ्यास में लगा रहे॥ ७९॥ एवं भवेद्घटावस्था संतताभ्यासयोगतः । अनभ्यासवतश्चैव वृथागोष्ठ्या न सिद्ध्यति ॥ ८० ॥ इस प्रकार लगातार योग के अभ्यास से उसे घटावस्था की प्राप्ति हो जाती है; परन्तु इस तरह की सिद्धि अभ्यास के द्वारा ही मिल सकती है, केवल बातों से कुछ भी सिद्ध नहीं हो सकता ॥ ८० ॥ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन योगमेव सदाभ्यसेत् । ततः परिचयावस्था जायतेऽभ्यासयोगतः ॥ ८१ ॥ वायुः परिचितो यत्नादग्निना सह कुण्डलीम् । भावयित्वा सुषुम्नायां प्रविशेदनिरोधतः ॥ ८२ ॥ अतः योगी को निरन्तर प्रयत्नपूर्वक योग का अभ्यास करते रहना चाहिए। तदनन्तर अभ्यास योग से 'परिचय अवस्था' का शुभारम्भ होता है। उस (अवस्था) के लिए प्रयत्नपूर्वक वायु से प्रदीप्त अग्नि सहित कुण्डलिनी को साधना के द्वारा जाग्रत् करके भावनापूर्वक सुषुम्ना में अवरोध रहित प्रवेश कराना चाहिए॥ वायुना सह चित्तं च प्रविशेच्च महापथमू । यस्य चित्तं स्वपवनं सुषुम्नां प्रविशेदिह ॥ ८३ ॥ भूमिरापोऽनलो वायुराकाशश्चेति पञ्चकः । येषु पञ्चसु देवानां धारणा पञ्चधोच्यते ॥ ८४ ॥ तत्पश्चात् वायु के सहित चित्त को महापथ में अग्रसर करना चाहिए। जिस योगी का चित्त वायु के सहित 'सुषुम्ना' नाड़ी में प्रविष्ट हो जाता है, उसे पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु तथा आकाश इन पञ्च महाभूत रूपी देवों की पाँच प्रकार की धारणा हो जाती है॥ ८३-८४॥ पादादिजानुपर्यन्तं पृथिवीस्थानमुच्यते । पृथिवी चतुरस्रं च पीतवर्णं लवर्णकम् ॥ ८५ ॥ पार्थिवे वायुमारोप्य लकारेण समन्वितम् । ध्यायेश्चतुर्भुजाकारं चतुर्वक्त्रं हिरण्मयम् ॥ ८६ ॥ पैरों से जानु (घुटनों) तक पृथ्वी तत्त्व का स्थान बतलाया गया है। चार कोनों से युक्त यह पृथ्वी, पीत वर्ण, 'ल' कार से युक्त कही गयी है। पृथ्वी तत्त्व में वायु को आरोपित करते हुए 'ल' कार को उसमें संयुक्त करके उस स्थान में स्वर्ण के समान रंग से युक्त चार भुजाओं एवं चतुर्मुख ब्रह्मा जी का ध्यान करना चाहिए ॥