भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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२६८ योगतत्त्वोपनिषद् मनुष्यो वापि यक्षो वा स्वेच्छयापि क्षणाद्भवेत्। सिंहो व्याघ्रो गजो वाश्वः स्वेच्छया बहुतामियात् ॥ ११० ॥ योगी स्वेच्छा से मनुष्य अथवा यक्ष का रूप भी क्षणभर में धारण कर सकता है। वह सिंह, हाथी, घोड़ा आदि अनेक रूपों को स्वेच्छापूर्वक धारण कर सकने में समर्थ होता है ॥ ११०॥ यथेष्टमेव वर्तेत यद्वा योगी महेश्वरः । अभ्यासभेदतो भेदः फलं तु सममेव हि ॥ १११ ॥ महेश्वर पद के प्राप्त हो जाने पर योगी इच्छानुकूल व्यवहार कर सकता है। यह भेद तो मात्र अभ्यास का ही है, फल की दृष्टि से तो दोनों समान ही हैं ॥ १११ ॥ पार्ष्णि वामस्य पादस्य योनिस्याने नियोजयेत् । प्रसार्य दक्षिणं पादं हस्ताभ्यां धारयेद्दृढम् ॥ साधक को चाहिए कि बाँयें पैर की एड़ी के द्वारा योनि स्थान को दबाये तथा दायें पैर को फैलाकर के उस पैर के अँगूठे को मजबूती से पकड़ ले ॥ ११२ ॥ चुबुकं हृदि विन्यस्य पूरयेद्वायुना पुनः । कुम्भकेन यथाशक्ति धारयित्वा तु रेचयेत् ॥ ११३ ॥ इसके बाद थोड़ी को छाती से लगा लेना चाहिए। तदनन्तर वायु को धीरे-धीरे अन्दर धारण करे और शक्ति के अनुसार कुम्भक करे, फिर रेचक के द्वारा वायु को बाहर निकाल देना चाहिए ॥ ११३ ॥ वामाङ्गेन समभ्यस्य दक्षाङ्गेन ततोऽभ्यसेत् । प्रसारितस्तु यः पादस्तमूरूपरि नामयेत् ॥ ११४ इस क्रिया को निरन्तर अभ्यास पूर्वक बाँयें अंग से करने के उपरान्त दायें अंग से करे अर्थात् जो पैर फैलाया हुआ था, उसे योनि के स्थान पर लगाये और जो योनि के स्थान पर था, उसे फैलाकर अँगूठे को दृढ़तापूर्वक पकड़ लेना चाहिए ॥ ११४॥ अयमेव महाबन्ध उभयत्रैवमभ्यसेत् । महाबन्धस्थितो योगी कृत्वा पूरकमेकधीः ॥ ११५ ॥ वायुना गतिमावृत्य निभृतं कण्ठमुद्रया । पुटद्वयं समाक्रम्य वायुः स्फुरति सत्वरम् ॥ ११६ ॥ यह ही महाबन्ध कहलाता है। इस बन्ध का दोनों ही प्रकार से अभ्यास किया जाता है। महाबन्ध की क्रिया में सतत संलग्न रहने वाले योगी को एकाग्र होकर कण्ठ की मुद्रा द्वारा वायु की गति को आवृत करके दोनों नासिका-रन्ध्रों को संकुचित करने से तत्परतापूर्वक वायु भर जाती है ॥ ११५-११६॥ अयमेव महावेधःसिद्धैरभ्यस्यतेऽनिशम् । अन्तःकपालकुहरे जिह्वां व्यावृत्य धारयेत् ॥ ११७ भ्रूमध्यदृष्टिरप्येषा मुद्रा भवति खेचरी । कण्ठमाकुञ्च्य हृदये स्थापयेद्दृढया धिया ॥ ११८ ॥ बन्धो जालंधराख्योऽयं मृत्युमातङ्गकेसरी । बन्धो येन सुषुम्नायां प्राणस्तूड्डीयते यतः ॥ ११९ ॥ उड्यानाख्यो हि बन्धोऽयं योगिभिः समुदाहृतः । पार्ष्णिभागेन संपीड्य योनिमाकुञ्चये- दृढम् ॥१२० ॥ अपानमूर्ध्वमुत्थाप्य योनिबन्धोऽयमुच्यते । प्राणापानौ नादबिन्दू मूलबन्धेन चैकताम् ॥ १२१ ॥ गत्वा योगस्य संसिद्धिं यच्छतो नात्र संशयः । करणी विपरीताख्या सर्वव्याधिविनाशिनी ॥ १२२ ॥ सिद्ध योगीजन इस (ऊपर वर्णित) महावेध का निरन्तर अभ्यास करते रहते हैं। जिह्वा को लौटाकर, अन्तः कपाल-कुहर में लगाकर दोनों भृकुटियों के मध्य में दृष्टि को स्थिर करना खेचरी मुद्रा है। कण्ठ को संकुचित करके (थोड़ी को) दृढ़तापूर्वक वक्ष पर स्थापित करना ही जालन्धर बन्ध कहलाता है। जो मृत्यु रूपी हाथी के लिए सिंह के समान होता है। जिस बन्ध से प्राण सुषुम्ना में उठ जाता है। उसे योगी लोग उड्डियान