भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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३४ आत्मबोधोपनिषद्

विवेकयुक्तिबुद्ध्याहं जानाम्यात्मानमद्वयम्। तथापि बन्धमोक्षादिव्यवहारः प्रतीयते ॥ ११॥ मैं विवेक-बुद्धि से युक्त हूँ। मैं आत्मा को अद्वैत रूप में जानता हूँ, तब भी (शरीर रहते) बन्ध, मोक्ष आदि व्यवहार वाला हूँ॥ ११॥ निवृत्तोऽपि प्रपञ्चो मे सत्यवद्भाति सर्वदा। सर्पादौ रज्जुसत्तेव ब्रह्मसत्तैव केवलम् ॥ १२॥ प्रपञ्चाधाररूपेण वर्ततेऽतो जगन्न हि। यथेश्कुरससंव्याप्ता शर्करा वर्तते तथा ॥ १३॥ अद्वयब्रह्मरूपेण व्याप्तोऽहं वै जगत्त्रयम्। ब्रह्मादिकीटपर्यन्ताः प्राणिनो मयि कल्पिताः ॥ १४ ॥ बुद्बुदादिविकारान्तस्तरङ्गः सागरे यथा। तरङ्गस्थं द्रवं सिन्धुर्न वाञ्छति यथा तथा ॥ १५॥ विषयानन्दवाञ्छा मे मा भूदानन्दरूपतः। दारिद्र्याशा यथा नास्ति संपन्नस्य तथा मम ॥ १६ ॥ ब्रह्मानन्दे निमग्नस्य विषयाशा न तद्भवेत्। विषं दृष्ट्वाऽमृतं दृष्ट्वा विषं त्यजति बुद्धिमान् ॥ १७॥ आत्मानमपि दृष्ट्वाह्मनात्मानं त्यजाम्यहम्। घटावभासको भानुर्घटनाशे न नश्यति ॥ १८ ॥ देहावभासकः साक्षी देहनाशे न नश्यति। न मे बन्धो न मे मुक्तिर्न मे शास्त्रं न मे गुरुः ॥ १९ ॥ मेरी दृष्टि से प्रपञ्च निवृत्त (दूर) हो गया है, तब भी सर्वदा वह सत्य के सदृश प्रतिभासित होता है। निश्चय ही सर्प आदि में जिस प्रकार रस्सी का अस्तित्व है, उसी प्रकार ही प्रपञ्च का भी अस्तित्व है। केवल मात्र ब्रह्म सत्ता के आधार पर ही प्रपञ्च का व्यवहार है, यह जगत् तो है ही नहीं। जिस तरह शक्कर गन्ने के रस में व्याप्त है, उसी तरह ही अद्वैत ब्रह्म आनन्द रूप में तीनों लोकों में विद्यमान है। जिस प्रकार सागर में बुलबुले से लेकर तरंगें तक कल्पित हैं, उसी प्रकार मेरे द्वारा ब्रह्म से लेकर कीट पर्यन्त प्राणिमात्र कल्पित हैं। जिस तरह समुद्र की तरंगों में रहने वाले जल की इच्छा नहीं करते, उसी तरह केवल आनन्द स्वरूप होने में मुझे विषयों के आनन्द की कोई भी इच्छा नहीं रहती। जिस तरह सम्पत्ति से सम्पन्न व्यक्ति को दरिद्रता की कोई संभावना नहीं रहती, उसी तरह ही ब्रह्म के आनन्द में निमग्न रहने वाले मुझको विषयों की कोई आशा नहीं रहती। बुद्धिमान् पुरुष जिस प्रकार विष और अमृत को देख करके विष का परित्याग कर देता है, उसी प्रकार मैं आत्मा को देख करके अनात्मा का परित्याग कर देता हूँ। जैसे घट (घड़े) को प्रकाश देने वाला सूर्य घड़े के नष्ट होने से स्वयं नष्ट नहीं हो जाता, वैसे ही शरीर को प्रकाश देने वाला साक्षी-परमात्मा, शरीर के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता। न मेरे लिए कोई बन्धन है और न ही मुक्ति, न मेरे लिए कोई शास्त्र है और न ही मेरा कोई गुरु ॥ १२-१९॥ मायामात्रविकासत्वान्मायातीतोऽहमद्वयः । प्राणाश्चलन्तु तद्धर्मैः कामैर्वा हन्यतां मनः ॥२०॥ आनन्दबुद्धिपूर्णस्य मम दुःखं कथं भवेत्। आत्मानमञ्जसा वेद्मि क्वाप्यज्ञानं पलायितम् ॥२१॥ ये सब तो माया के विकास मात्र हैं तथा मैं (आत्मा) माया से परे स्वयं अद्वैत रूप हूँ। प्राण भले ही निकल जायें और मन चाहे अपने धर्मों एवं कामनाओं से विनाश को प्राप्त हो जाये; परन्तु आनन्द एवं बुद्धि की पूर्णता के कारण मुझे कैसे दुःख प्राप्त हो सकता है? मैं आत्मा को तो अनायास-सहज ही जानता हूँ, मेरा अज्ञान न मालूम कहाँ पलायन कर गया है ॥ २०-२१ ॥ कर्तृत्वमद्य मे नष्टं कर्तव्यं वापि न क्वचित्। ब्राह्मण्यं कुलगोत्रे च नामसौन्दर्यजातयः ॥ २२॥ स्थूलदेहगता एते स्थूलाद्भिन्नस्य मे नहि। क्षुत्पिपासान्ध्यबाधिर्यकाम-क्रोधादयोऽखिलाः ॥२३॥ लिङ्गदेहगता एते ह्यलिङ्गस्य न सन्ति हि। जडत्वप्रियमोदत्वधर्माः कारणदेहगाः ॥२४॥

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