भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

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अध्याय ३ खण्ड १० मन्त्र २ ११७ जो इस प्रकार इस अमृत को जानता है, वह साधक आदित्यगणों में से एक होकर वरुण देव के नेतृत्व में अमृत को देखकर तृप्त हो जाता है। वह इस रूप से ही अक्रिय होता है और इसी से उद्यमशील होता है॥ स यावदादित्यो दक्षिणत उदेतोत्तरतोऽस्तमेता द्विस्तावत्पश्चादुदेता पुरस्तादस्तमेता- ऽऽदित्यानामेव तावदाधिपत्यꣳस्वाराज्यं पर्येता ॥ ४ ॥ वह सूर्य जब तक दक्षिण भाग से उदित होता और उत्तर भाग से अस्त होता है, उससे दुगुने समय तक पश्चिम भाग से उदित होता और पूर्व भाग से अस्त होता है। उतने समय तक वह (साधक) आदित्यगणों के ही अधिकार एवं स्वाराज्य को प्राप्त होता है ॥ ४ ॥ ॥ नवमः खण्डः ॥ अथ यच्चतुर्थममृतं तन्मरुत उपजीवन्ति सोमेन मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १ ॥ यह जो अत्यन्त कृष्ण रूप चतुर्थ अमृत है, मरुद्गण सोमदेव के नेतृत्व में उसमें जीवन धारण करते हैं। वे देवगण न तो खाते हैं, न पीते हैं, वे इस अमृत को देखकर ही तृप्त हो जाते हैं ॥१॥ त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति ॥ २ ॥ वे इस रूप को ध्यान में केन्द्रित कर अक्रिय (ध्यानस्थ) होते हैं और इसी से सक्रिय अथवा उद्यमशील भी होते हैं ॥ २ ॥ स य एतदेवममृतं वेद मरुतामेवैको भूत्वा सोमेनैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ॥ ३ ॥ जो इस प्रकार इस अमृत रूप को जानता है, वह मरुद्गणों में से कोई एक होकर सोमदेव के नेतृत्व में इस अमृत रूप को देखकर तृप्त हो जाता है। वह इस रूप को ध्यान में केन्द्रित कर अक्रिय हो जाता है तथा इसी से सक्रिय भी होता है ॥ ३ ॥ स यावदादित्यः पश्चादुदेता पुरस्तादस्तमेता द्विस्तावदुत्तरत उदेता दक्षिणतोऽस्तमेता मरुतामेव तावदाधिपत्यꣳ स्वाराज्यं पर्येता ॥ ४ ॥ वह आदित्य जब तक अपने पश्चिम भाग से उदित होता और पूर्व से अस्त होता है, उससे दुगुने समय तक वह उत्तरभाग से उदित होता और दक्षिण से अस्त होता है। उतने समय तक वह (साधक) मरुद्गण के ही अधिकार और स्वाराज्य को प्राप्त करता है ॥ ४ ॥ ॥ दशमः खण्डः ॥ अथ यत्पञ्चमममृतं तत्साध्या उपजीवन्ति ब्रह्मणा मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १ ॥ आदित्य के मध्य संचरित - स्पन्दित होता हुआ जो पंचम अमृत है, साध्यगण देव ब्रह्मा के नेतृत्व में उसमें जीवन धारण करते हैं, वे देवगण न तो खाते हैं, न पीते हैं, वे इस अमृत रूप को देखकर ही तृप्त हो जाते हैं ॥ २ ॥ त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति ॥ २ ॥ वे इस रूप को ध्यान में केन्द्रित कर ही अक्रिय (ध्यानस्थ) हो जाते हैं और इसीसे सक्रिय भी हो जाते हैं ॥