१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२१८ नादबिन्दूपनिषद् अधिष्ठाने तथा ज्ञाते प्रपञ्चे शून्यतां गते । देहस्यापि प्रपञ्चत्वात्प्रारब्धावस्थितिः कुतः ॥ २८ ॥ जिस तरह अधिष्ठान (आधार) स्वरूप आत्मतत्त्व का ज्ञान हो जाने पर प्रपञ्च (संसार) शून्यता को प्राप्त हो जाता है, ऐसी स्थिति में देह (शरीर) भी प्रपञ्चरूप (अयथार्थ) होने के कारण प्रारब्ध की स्थिति किस प्रकार रह सकती है? ॥ २८ ॥ अज्ञानजनबोधार्थं प्रारब्धमिति चोच्यते । ततः कालवशादेव प्रारब्धे तु क्षयं गते ॥ २९ ॥ अज्ञान से ग्रसित लोगों को बोध कराने के लिए प्रारब्ध कर्म की बात कही जाती है। तदनन्तर कालवश ही सांसारिक प्रारब्ध कर्मों का विनाश हो जाता है ॥ २९ ॥ ब्रह्मप्रणवसंधानं नादो ज्योतिर्मयः शिवः । स्वयमाविर्भवेदात्मा मेघापायेऽंशुमानिव ॥ ३० ॥ तत्पश्चात् (प्रारब्ध कर्मों के समाप्त होने पर) 'ॐकार' स्वरूप ब्रह्म की आत्मा के साथ एकता के चिन्तन से नादरूप में स्वयं प्रकाशमान शिव के कल्याणकारी स्वरूप (परब्रह्म) का प्रादुर्भाव उसी प्रकार हो जाता है, जिस प्रकार बादलों के हट जाने पर भगवान् भास्कर प्रकाशित हो जाते हैं ॥ ३० ॥ सिद्धासने स्थितो योगी मुद्रां संधाय वैष्णवीम् । शृणुयाद्दक्षिणे कर्णे नादमन्तर्गतं सदा ॥ ३१ ॥ योगी (साधक) को सिद्धासन से बैठने के पश्चात् वैष्णवी मुद्रा धारण करनी चाहिए। तदनन्तर दाहिने कान के अन्दर उठते हुए नाद (अनाहत ध्वनि) का सतत श्रवण करना चाहिए ॥ ३१ ॥ [ बायें पैर की एड़ी से गुदा स्थान को तथा दाहिने पैर से जननेन्द्रिय मूल को दबाकर, शरीर को सीधा रखकर त्रिबन्ध (मूल, जालन्धर, उड्डीयान) लगाने को सिद्धासन कहा जाता है तथा अपलक नेत्रों से बाह्य दृष्टि को अन्तर्लक्ष्य करके (भ्रुकुटि-मध्य में) देखना वैष्णवी मुद्रा कहलाती है।] अभ्यस्यमानो नादोऽयं बाह्यमावृणुते ध्वनिः । पक्षाद्विपक्षमखिलं जित्वा तुर्यपदं व्रजेत् ॥ ३२ ॥ इस प्रकार नाद का किया गया अभ्यास बाह्य ध्वनियों को आवृत कर लेता है, इस तरह (योगी साधक) दोनों पक्षों 'अकार' और 'मकार' को जीतकर क्रमशः सम्पूर्ण 'ओंकार' को शनैः-शनैः आत्मसात् कर तुर्यावस्था को प्राप्त कर लेता है ॥ ३२ ॥ श्रूयते प्रथमाभ्यासे नादो नानाविधो महान् । वर्धमाने तथाभ्यासे श्रूयते सूक्ष्मसूक्ष्मतः ॥ ३३ ॥ अभ्यास की प्रारम्भिक अवस्था में यह महान् नाद (अनाहत ध्वनि) विभिन्न तरह से सुनायी देता है। इसके अनन्तर जब अभ्यास अधिक बढ़ जाता है, तब उसके सूक्ष्मातिसूक्ष्म रूप (भेद) सुनायी पड़ने लगते हैं ॥ ३३ ॥ आदौ जलधिजीमूतभेरीनिर्झरसंभवः । मध्ये मर्दलशब्दाभो घण्टाकाहलजस्तथा ॥ ३४ ॥ अन्ते तु किंकिणीवंशवीणाभ्रमरनिःस्वनः । इति नानाविधा नादाः श्रूयन्ते सूक्ष्मसूक्ष्मतः ॥ ३५ ॥