१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ३ ब्राह्मण ९ मन्त्र १ २९५ तद्वा एतदक्षरं गार्ग्यदृष्टं द्रष्ट्रश्रुतः श्रोत्रमतं मन्त्रविज्ञातं विज्ञातृ नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ नान्यदतोऽस्ति श्रोतृ नान्यदतोऽस्ति मन्तृ नान्यदतोऽस्ति विज्ञात्रेतस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्चेति ॥ ११ ॥ याज्ञवल्क्य ने कहा- हे गार्गी ! यह 'अक्षर' स्वयं दृष्टि का विषय नहीं है; किन्तु सभी को देखने वाला है, स्वयं श्रवण का विषय नहीं है; किन्तु सबकी सुनता है, स्वयं मनन का विषय नहीं है; किन्तु सबका मन्ता है, स्वयं अविज्ञात है; किन्तु सबका ज्ञाता है। हे गार्गी ! इस 'अक्षर' ब्रह्म में ही वह आकाश तत्त्व ओत-प्रोत है ॥ ११ ॥ सा होवाच ब्राह्मणा भगवन्तस्तदेव बहु मन्येध्वं यदस्मान्नमस्कारेण मुच्येध्वं न वै जातु युष्माकमिमं कश्चिद्ब्रह्मोद्यं जेतेति ततो ह वाचक्नव्युपरराम ॥ १२ ॥ इसके पश्चात् वाचक्नवी गार्गी बोली- हे पूजनीय ब्राह्मणो ! इसी (वार्तालाप से प्राप्त हुए ज्ञान) को बहुत समझो। इन (याज्ञवल्क्य) से नमस्कार करके ही पीछा छूट जाये, तो बहुत है; क्योंकि आपमें से किसी भी ब्रह्मज्ञानी के लिए इन्हें जीत सकना सम्भव नहीं है। इसके बाद वाचक्नवी गार्गी मौन हो गई ॥ १२ ॥ [ गार्गी ब्रह्मज्ञ विदुषी थी। उसके निर्णायक कथन को सभी ने स्वीकार किया, किन्तु आने वाले क्रम में शाकल्य विदग्ध अहंकारवश नहीं माने। अगले क्रम में उन्हें उस कुचेष्टा का दण्ड भोगना पड़ा।] ॥ नवमं ब्राह्मणम् ॥ अथ हैनँ विदग्धः शाकल्यः पप्रच्छ कति देवा याज्ञवल्क्येति स हैतयैव निविदा प्रतिपेदे यावन्तो वैश्वदेवस्य निविद्युच्यन्ते त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्री च सहस्रेत्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति त्रयस्त्रिंशदित्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति षडित्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति त्रय इत्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति द्वावित्यौमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येत्यध्यर्ध इत्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येत्येक इत्योमिति होवाच कतमे ते त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्री च सहस्रेति ॥ १ ॥ इसके उपरान्त शाकल्य विदग्ध ने ऋषि याज्ञवल्क्य से प्रश्न किया- हे याज्ञवल्क्य ! देवगण कितने हैं ? यह सुनकर याज्ञवल्क्य ने वैश्वदेव मन्त्रों की निविद में वर्णित देवताओं की संख्या प्रतिपादित की- तीन और तीन सौ, तीन और तीन सहस्र, इसका अभिप्राय हुआ तीन हजार तीन सौ छह। शाकल्य ने कहा- ठीक है। पुनः शाकल्य ने प्रश्न किया- देवताओं की संख्या कितनी है ? याज्ञवल्क्य ने कहा- तैंतीस। इसमें सहमति देकर पुनः शाकल्य ने प्रश्न पूछा- देवता कितने हैं ? तब याज्ञवल्क्य बोले- छः । इसे स्वीकार कर विदग्ध (शाकल्य) ने फिर पूछा- देवता कितने हैं ? उत्तर दिया गया-तीन । शाकल्य द्वारा 'ठीक है' कहने एवं पुनः यही पूछने पर कि देवता कितने हैं ? याज्ञवल्क्य ने कहा - दो । 'ठीक है' कहकर शाकल्य ने फिर पूछा- देवता कितने हैं ? याज्ञवल्क्य ने कहा- अध्यर्ध (डेढ़)। इस पर 'ठीक है' कहते हुए शाकल्य ने पुनः वही प्रश्न दोहराया, तब याज्ञवल्क्य ने कहा- देवता एक है। इसे स्वीकार कर शाकल्य ने कहा- वे तीन हजार तीन और तीन सौ तीन देवगण कौन से हैं ? ॥ १ ॥