१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४०६ शुकरहस्योपनिषद् ततो ब्रह्मोपदिष्टं वै सच्चिदानन्दलक्षणम्। जीवन्मुक्तः सदा ध्यायन्नित्यस्त्वं विहरिष्यसि ॥ ४७ ॥ इसमें सच्चिदानंद स्वरूप ब्रह्म का उपदेश है, जो तप से प्राप्त किया जाता है। तुम उस ब्रह्म का चिन्तन करते हुए जीवन मुक्त (जन्म मरण के बन्धन चक्र से मुक्त) हो जाओगे ॥४७॥ यो वेदादौ स्वरः प्रोक्तो वेदान्ते च प्रतिष्ठितः । तस्य प्रकृतिलीनस्य यः परः स महेश्वरः ॥ ४८ ॥ जो वेद के आरम्भ में स्वररूप ॐकार उच्चरित होता है तथा जो वेदान्त में प्रतिष्ठित है, जो प्रकृति में समग्र रूप से लीन होकर भी उससे परे है, वही महेश्वर है ॥ ४८ ॥ उपदिष्टः शिवेनेति जगत्तन्मयतां गतः । उत्थाय प्रणिपत्येशं त्यक्ताशेषपरिग्रहः ॥ भगवान् शिव के इस प्रकार के उपदेश को सुनकर मुनि शुकदेव सम्पूर्ण जगद्रूप परमेश्वर में तन्मय हो गये। तदनन्तर उठकर भगवान् को हाथ जोड़कर प्रणाम कर सम्पूर्ण परिग्रह का त्याग करके (तपोवन) चल दिये ॥ ४९ ॥ परब्रह्मपयोराशौ प्लवन्निव ययौ तदा । प्रव्रजन्तं तमालोक्य कृष्णद्वैपायनो मुनिः ॥ उन्हें प्रव्रज्या में जाते देखकर श्री वेदव्यास जी (कृष्ण द्वैपायन मुनि) को वियोग दुःख हुआ, परन्तु मुनि शुकदेव परब्रह्म रूप सागर में निर्द्वन्द्व तैरने के समान आनन्दमग्न थे ॥५०॥ अनुव्रजन्नाजुहाव पुत्रविश्लेषकातरः । प्रतिनेदुस्तदा सर्वे जगत्स्थावरजङ्गमाः ॥५१॥ पुत्र के वियोग में कातर हुए श्री वेदव्यास जी उनके पीछे चलते हुए उन्हें पुकारने लगे। उस समय उनकी पुकार का प्रत्युत्तर सम्पूर्ण जगत् के जड़-चेतन पदार्थों ने दिया ॥ ५१ ॥ तच्छ्रुत्वा सकलाकारं व्यासः सत्यवतीसुतः । पुत्रेण सहितः प्रीत्या परानन्दमुपेयिवान् ॥ ५२ ॥ उस उत्तर को सुनकर अपने पुत्र को सम्पूर्ण जगत् में संव्याप्त जानकर सत्यवती पुत्र मुनि वेदव्यास जी ने पुत्र के सहित व्यापक अनन्तरूप परब्रह्म की प्राप्ति की ॥ ५२ ॥ यो रहस्योपनिषदमधीते गुर्वनुग्रहात् । सर्वपापविनिर्मुक्तः साक्षात्कैवल्यमश्रुते साक्षात्कैवल्यमश्रुत इत्युपनिषत् ॥ ५३ ॥ जो साधक गुरु के अनुग्रह से इस रहस्योपनिषद् के तत्त्व दर्शन को जान लेता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर साक्षात् कैवल्य पद को प्राप्त होता है, यही उपनिषद् (रहस्यात्मक ज्ञान) है ॥ ५३ ॥ ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐसहनाववतु.........इति। शान्तिः ॥ ॥ इति शुकरहस्योपनिषत्समाप्ता ॥