भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद् ] [ १६५

ऐड़ी को गुदा के बांयी तरफ ओर बांयी ऐड़ी को गुदा के दाहिनी तरफ लगाकर बैठे तो वह योगासन कहा जाता है ॥ ३८ ॥ दोनों जांघों पर दोनों पैर के तलवों को रखकर बैठने से पद्मासन होता है जो सब व्याधियों और विषों का नाशक बतलाया गया है ॥ ३९ ॥ पद्मासन पर अच्छी तरह से बैठकर दाहिने हाथ से बांए पैर के अंगूठे को और बाँयें हाथ से दाहिने पैर के अंगूठे को पकड़ना बद्ध-पद्मासन कहलाता है ॥ ४० ॥

पद्मासनं सुसंस्थाप्य जानूर्वोरन्तरे करौ । निवेश्य भूमावातिष्ठेद्ब्योमस्थः कुक्कुटासनः ॥४१ कुक्कूटासनबन्धस्थो दोभ्यां संवध्य कन्धरम् । शेते कूर्मवदुत्तान एतदुत्तानकूर्मकम् ॥४२ पादांगुष्ठौ तु पाणिभ्यां गृहीत्वा श्रवणावधि । धनुराकर्षकाकृष्टं धनुरासनमीरितम् ॥४३ सीवनीं गुल्फदेशेभ्यो निपीड्य व्युत्क्रमेण तु । प्रसार्य जानुनोर्हस्तावासनं सिंहरूपकम् ॥४४ गुल्फौ च वृषणस्याधः सीविन्युभयपार्श्वयोः । निवेश्य भूमौ हस्ताभ्यां बद्धवा भद्रासनं भवेत् ॥४५

पद्मासन पर अच्छी तरह बैठकर दोनों हाथों को जानु और जंघाओं के बीच से निकाल कर भूमि पर लगाकर शरीर को आकाश में अधर स्थित रखने से कुक्कुट-आसन होता है ॥ ४१ ॥ कुक्कुट आसन लगाकर दोनों भुजाओं से दोनों कंधों को बांधकर कछुए के समान सीधा हो जाना उत्तान-कूर्मासन कहा जाता है ॥ ४२ ॥ दोनों पैरों के अंगूठों को पकड़ कर धनुष के आकार में कानों तक खींचे तो यह धनुराशन होता है ॥ ४३ ॥ दोनों एड़ियों से सींवन- स्थान को विपरीत विधि से दबाकर दोनों घुटनों तथा हाथों को फैला-