१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५०४ ] [ मण्डलब्राह्मणोपनिषत्
यत्रयत्र मनो याति तत्रतत्र परं पदम् । तत्रतत्र परं ब्रह्म सर्वत्र समवस्थितम् ॥१६
जल में मिलाया हुआ नमक उसी में घुलमिल जाने के समान, मन जब आत्मा में विलीन हो जाता है उस अवस्था को समाधि कहते हैं। प्राणायाम के द्वारा सम्यक् रूप से क्षीण हुआ प्राणवायु जब कुम्भक में स्थिर होता है और चित्तवृत्तियों का लोप हो जाता है, तब चित्त और आत्मा का एकीभाव समाधि कहा जाता है। समाधि उस अवस्था का नाम है, जिसमें जीव आत्मा का परमात्मा से समत्व होने पर सभी सङ्कल्प मिट जाते हैं। सांसारिक बोध-रहित जिस स्थिति में मन-बुद्धि का पूर्ण विलीनीकरण हो जाने पर सब कुछ शून्यवत् दिखाई पड़ता है, उस अवस्था को निरामय कहते हैं, वही समाधि कही जाती है। शरीर के इधर-उधर गमन करने पर भी चित्त का निश्चल एवं ध्यानमग्न रहना समाधि की अवस्था ही है। उस अवस्था में साधक का मन जहाँ भी गमन करता है, वहीं उसे परम पद उपलब्ध होता है। उसके लिए परम ब्रह्म सर्वत्र समान रूप से अवस्थित रहता है ॥ १४-१६ ॥
तृतीयः खण्डः
अथ हैन देवा ऊचुर्नवचक्रविवेकमनुब्रूहीति । तथेति स होवाच— आधारे ब्रह्मचक्रं त्रिरावृत्तभङ्गीमण्डलाकारं तत्र मूलकन्दे शक्तिः पावकाकारं ध्यायेत् तत्रैव कामरूपपीठं सर्वकामप्रदं भवति इत्याधारचक्रम् ॥ १ ॥ द्वितीयं स्वाधिष्ठानचक्रं षड्दलं तन्मध्ये पश्चिमाभिमुखं