भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 116, कुल 418 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 116

था। परंतु वह जंगलीपन से अर्थात् एक आघात से मारा गया था। परंतु अंग्रेजों ने उस त्रुटि को सुधारकर बहुत अच्छा किया। वे कोर्ट मार्शल के आगे केवल दृष्टिपात होते ही फांसी का दंड दिए गए सैकड़ो लोगों को, उनके फांसी के खंभे खड़े करते हुए ही पैशाचिक यंत्रनाएं देने लगते, उनके सिर के बाल तड़ातड़ तोड़ते, उनके शरीर में बैनेट के सिरे से आर-पार छेद किए जाते और तत्पश्चात् इन सारी यंत्रणाओं और प्रत्यक्ष मृत्यु को भी जिसके उन गरीब, निर्दोष और निरपराध हिंदू लोगों के मुंह में, उनके फांसी पर चढ़ने सिपाही उन गरीब, निर्दोष और निरपराध हिंदू लोगों के मुंह में, उनके फांसी पर चढ़ने को तैयार होने पर भी, जबरन गाय का कच्चा मांस कुचल-कुचलकर भरते।56

वह कोर्ट मार्शल क्या झमेला था, यह जंगली पाठक वर्ग को बताना रह ही गया। गांवों के निरपराध लोगों को सैकड़ों की संख्या में पकड़कर उनका ‘न्याय’ किया जाता। यह न्याय की घुट्टी यूरोपियन राष्ट्र पहले से ही पिए होते हैं। नीदरलैंड की राज्य क्रांति में अल्वा ने भी ऐसा ही एक न्यायसन स्थापित किया था। उस न्यायसन की कार्यवाही इतने ध्यान से चलती कि वहां के न्यायाधीश बीच में ही सो जाते और दंड देने का समय आने पर उन्हें हिलाकर जगाए जाने पर जितने कैदी सामने दिखते उतनों की ओर एक गंभीर नज़र डालकर वह कहते, “चढ़ाओ इन्हें फांसी पर!” नीदरलैंड के इतिहास में अंकित इस ‘यमासन’ को अंग्रेजों ने सुधरकर विकसित किया था, इसमें कोई शंका नहीं, क्योंकि इनके न्यायाधीश कभी भी सोते नहीं थे। इतना ही नहीं, कोर्ट मार्शल पर नियुक्त होने के पूर्व उन्हें यह शपथ लेनी पड़ती थी की हम निरपराध या अपराधी यह भेद न करके सबको फांसी का दंड देंगे। यह पवित्र शपथ लेकर अंग्रेज लोग निरपराध नेटिव को फांसी पर चढ़ाने के लिए जहां न्याय करते हैं उस स्थान को अंग्रेजी भाषा में ‘कोर्ट मार्शल’ कहा जाता है।

मेरठ और दिल्ली में मारे गए मुट्ठी भर अंग्रेज लोगों के लिए हजारों निरपराध लोगों से ऐसा पैशाचिक प्रतिशोध लेते हुए कमांडर बर्नार्ड दिल्ली के पास पहुंचने के पहले मेरठ में शेष बची गोरी सेना से मिलने का अवसर देख रहा था। मेरठ में अंग्रेजों की बड़ी सेना थी, यह पहले कहा जा चुका है। वह सेना अंबाला से निकली सेना से

1857 का स्वातंत्र्य समर – 120

56 1. होम्स कृत-‘हिस्ट्री ऑफ द सीज ऑफ दिल्ली’। 2. ‘सैनिक पंच न्यायालय के आसन को ग्रहण करने के पूर्व प्रत्येक पंच द्वारा यह शपथ ग्रहण की जाती थी कि मैं बंदी के अपराध अथवा निर्दोष होने की चिंता न करते हुए उसे प्राणदंड दूंगा। और यदि उनमें से कोई इस विवेकहीन निर्णय के विरूद्ध अपना मुख खोलता भी था तो उसके अन्य साथी उसका मुख बंद कर देते थे। निर्णय के तत्काल उपरांत ही फांसी के फंडों पर जाते हुए बंदियों को प्रताड़ना दी जाती थी और उनका उपहास भी किया जाता था। उन्हें अनाड़ी-हत्यारे भांति-भांति की यंत्रणाएं देते थे और पड़े-लिखे अधिकारी मनोरंजन करते थे।’ —होम्स कृत-‘हिस्ट्री ऑफ द सेपॉय वार’ पृष्ठ 124

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर) · पृष्ठ 116, कुल 418 में से · BharatKosha