भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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मिलने नीचे उतर रही थी। परंतु इन सेनाओं के मिलने के पहले ही उनसे दो-दो हाथ करने क्रांतिकारी दिल्ली से आगे आए हुए थे। हिंडन नदी के किनारे दोनों 30 मई को मिले। क्रांतिकारियों का दायां बाजू तोपों से सुरक्षित था। अतः उस ओर मुंह मारने का प्रयास करने में अंग्रेजों को सफलता नहीं मिल रही थी। दाई ओर तोपों और संगीनों की लड़ाई अच्छी जम रही थी, इतने में अंग्रेजों की मार के सामने बिल्कुल न टिकते हुए क्रांतिकारियों का बायां बाजू उखड़ने लगा। यह देखते ही उनकी पंक्तियों में भगदड़ मच गई और पांच तोपों को शत्रु के हाथों छोड़कर वे दिल्ली लौट आए। इस पहली लड़ाई में तत्काल मृत्यु गले लगाई। अन्य अपने कर्तव्य करें न करें, परंतु स्वयं मरने के पहले अपना जीवन किसी तरह सार्थक कर जाऊं ऐसी उदात्त स्फूर्ति से उस 11वीं रेजिमेंट के सिपाही ने अंग्रेजों के हाथों तोप पड़ेगी, यह जानते ही जान-बूझकर तोप और बारूदखाने में बंदूक चलाई। उसके जगी धमाके में कैप्टन एंड्रयूज और उसके सारे साथी जलकर सिरकमल अर्पित करने के बाद उस देशवीर ने अपना भी सिरकलम उसकी सेवा में जिस तरह अंग्रेज इतिहासकार रम जाते हैं, वैसे ही केवल राष्ट्र-कार्य के लिए प्राण निछावर करनेवाले उस शूर सिपाही के स्तुति स्तोत्र गाने में क्या उसके देशबंधुओं को नहीं रंगना चाहिए? पर इस शहीद का नाम भी इतिहास को ज्ञात नहीं। इस देशवीर के लिए 'के' कहता है-“विद्रोहियों में भी ऐसे अनेक शूरवीर विद्यमान थे जो अपने राष्ट्र-कार्य की सफलता हेतु प्रसन्न वदन मृत्यु का आलिंगन करने को तत्पर रहते थे तथा काल को भी चुनौती देते थे।57 इस पहली लड़ाई में अंग्रेजों की पूर्ण विजय हो जाने से कलकत्ता तक इस अनुमान से डाक द्वारा यह पूछताछ होने लगी कि अब एक-दो दिन में दिल्ली गिरने को है; परंतु वास्तविक स्थिति कितनी अलग थी। इस अभूतपूर्व, आकस्मिक और अस्त-व्यस्त क्रांतियुद्ध का विकराल स्वरूप देखकर भी वह पहला धक्का सहकर उस पर अंकुश लगाने की खूबी और हिम्मत यद्यपि उत्पन्न नहीं हुई थी, तो भी अपने स्वदेश को स्वतंत्र किए बिना जब तक जान में जान है तब तक रुकना नहीं, तो भी अपने स्वदेश को स्वतंत्र किए बिना जब तक जान में जान है तब तक रुकना नहीं, यह इच्छा अवश्य अति उत्कटता से दिल्ली के हजारों नागरिकों के हृदय में उछल रही थी और इसीलिए दिनांक 30 मई की पराजय के लिए सारी रात नागरिकों द्वारा धिक्कारे गए सिपाही फिर से 31 मई को बाहर निकले। क्रांतिकारियों की तोपों की भारी मार शुरू होते ही अंग्रेजों ने भी अपनी तोपें दागनी शुरू की। क्रांतिकारियों की तोपें आज अच्छे अनुशासन और बड़ी 1857 का स्वातंत्र्य समर – 121 57 के कृत-'हिस्ट्री ऑफ इंडियन म्युटिनी', खंड 2, पृष्ठ 138।