१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजिद से हमला कर रही थीं, इसलिए अंग्रेजों को प्राणहानि भी बहुत होने लगी। मई माह की धूप अंग्रेजों को असह्य थी सो अलग। फिर भी अंग्रेजों ने कल की तरह हमला करने का प्रयास किया, पर वह सफल नहीं हो रहा था। अंत में शाम को अंग्रेज अंतिम हमला करने निकले। इसके आगे उन्हें रोकना कठिन होगा, यह देखते ही क्रांतिकारियों ने तोपों का एक भयानक हमला किया और उस हमले से अंग्रेजों की तितर-बितर हुई सेना फिर से एकत्रित हो तब तक अपनी तोपें संभालते हुए रणांगण छोड़ दिया। कोई बात नहीं एक दिन में स्थिति कुछ सुधरी ही है। कल और ऐसी तीसरी पराजय झेली तो भी अंग्रेजों की दुर्दशा होगी, क्योंकि अब उनमें क्रांतिकारियों से छोटी हाथापाई करने लायक भी शक्ति नहीं है। जून की पहली तारीख को ऐसी चिंता में पड़े अंग्रेजी कैंप के पीछे से एक सेना आती दिखी। अपनी पिछाड़ी पर चली आ रही यह सेना काले रंग की है, यह देखते ही अंग्रेजों में हड़बड़ी मच गई और वे किसी तरह संरक्षण के लिए तैयार होते, तभी उनके ध्यान में आया कि वह क्रांतिकारियों की सेना नहीं है। अपितु मेजर रीड की अधीनता में अंग्रेजों की ओर से लड़ने गुरखे आ रहे हैं। अंबाला से नीचे आ रही अंग्रेजी ऐसी स्थिति में बेचारे गरीब क्रांतिकारी क्या करेंगे? ये दोनों अंग्रेजी सेनाएं 7 जून को एक-दूसरे से मिल गईं। इस समय दिल्ली पर घेरा डालने के लिए तैयार करवाई गई सीजट्रेन भी नाभा के राजा की सहायता से सही-सलामत आ पहुंची। इस सीजट्रेन के अंबाला पहुंचते ही उसे साथ लेकर 5वीं रेजिमेंट सहित अंग्रेजों की इकट्ठी हुई वह सेना हमला करने के लिए दिल्ली के पास के अलीपुर गांव तक आ पहुंची। अंग्रेजी सेना क अलीपुर पहुंचने का समाचार सुनते ही क्रांतिकारी फिर से दिल्ली के बाहर निकले और उनका बुंदेल की सराय नामक स्थान पर अंग्रेजी सेना से सामना हुआ। इस समय अंग्रेजों की सेना भरपूर सामग्री, उत्तम सेनापति, ताजा दम सैनिकों और लाभ का स्थान-इतनी बातों से युक्त थी तो क्रांतिकारियों की ओर उनकी सदिच्छा के सिवाय दूसरी कोई शक्ति नहीं थी। जिसने रणभूमि का कभी मुंह भी नहीं देखा, ऐसे एक राजपुत्र पर सेनापतित्व का दायित्व था। उनकी संख्या में सिपाहियों से असैनिक ही अधिक थे और उसमें भी अपने ही देशबंधु सिख और गुरखा-फिरंगियों की ओर हाने से उनका मन निरूत्साहित था। ऐसी स्थिति में यह लड़ाई एक बहुत बड़ा तमाशा होगा, की विलक्षण चेतना उन सिपाहियों के मन में उत्पन्न हो गई थी, जिससे उन्होंने अंग्रेजी सेना को टक्कर देने में ऐसा कमाल किया कि अंग्रेजों को जल्दी ही समझ में आ गया, यह तमाशा न होकर वास्तव में जान लेने या देनेवाली लड़ाई है। दिल्ली की सेना की तोपें इतनी जिद और जोर से जोर मार करने लगीं कि ऐसा लगने लगा जैसे उसके सामने अंग्रेजी 1857 का स्वातंत्र्य समर - 122