१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसेना की कुछ भी नहीं चलेगी। अंग्रेजी तोपखाने के गोलंदाज और अधिकारी चट-पट मरने लगे और क्रांतिकारियों की तोपों की मार और भी तेज हो गई। यह देखते ही अंग्रेजों ने अपनी पैदल सेना को तोपों पर हमला करने का कड़ा आदेश दिया। अंग्रेजी पैदलों का वह हल्ला देखते-ही-देखते क्रांतिकारियों के तोपखाने से आकर भिड़ गया, फिर भी उस दिन क्रांतिकारी तोपें छोड़कर एक इंच भी इधर-उधर नहीं हुए। स्वराज्य और स्वदेश के लिए लड़नेवाले वीरों को शोभा दे, ऐसी ही अटल रीति से अंग्रेजी सेना की संगीन छाती में घुसने तक उन्होंने अपना स्थान नहीं छोड़ा। परंतु ऐसे शूर मर्दों को अपनी कृति से उत्तेजना देना तो दूर, उनके साथ अंत तक केवल खड़ा रहनेवाला सेनापति भी उन्हें नहीं मिला था, बल्कि जब अंग्रेजों की संगीन छाती में घुसने के बाद भी अपना स्थान छोड़कर एक पैर भी पीछे न हटानेवाले वीर स्वदेश और स्वधर्म के लिए प्राण न्योछावर कर रहे थे तो उनका कमांडर-इन-चीफ तोप की पहली आवाज होते ही सिर पर पांव रखकर दिल्ली भाग गया था। इतने में उस अभागी सेना क बाई ओर अंग्रेजों के घुड़सवार टूट पड़े और उनपर पीछे से होपग्रांट ने घुड़सवार-तोपखाने से हमला किया। इस तरह अपनों और परायों द्वारा अनाथ हुई वह सेना दिन भर लड़ी गई लड़ाई का कुछ भी श्रेय न मिलने पर तितर-बितर होकर दिल्ली में घुसने लगी। वैसे ही धकियाते जाने का आदेश दिय और वह अंग्रेजी सेना उस दिन शाम तक दिल्ली की दीवारों से आ भिड़ी। उस दिन की लड़ाई में क्रांतिकारियों का शहर-बाहर का सारा कब्जा नष्ट हो गया और अंग्रेजों को दिल्ली पर मोरचा लगाने के लिए अति उत्तम स्थान मिल गये। यहां यह कहना आवश्यक है कि उस दिन की लड़ाई में सीमूर की गुरखा पलटन ने बड़ा पराक्रम दिखाया, इसलिए अंग्रेजी इतिहासकार उन्हें बहुत शाबासी देते हैं। स्वदेश स्वतंत्रता के गले पर छुरी चलाने सदा-सर्वदा के लिए शापित शूरता दिखाने के कारण उन गुरखों के नाम सदा-सर्वदा के लिए शापित हुए हैं, इसमें तिल भर भी शंका नहीं। इन देशद्रोही गुरखों की सहायता से अंग्रेजों ने बुंदेल का सराय की लड़ाई जीती अवश्य, परंतु इस जय ने उनके मनोराज्य को धूल में मिला दिया; क्योंकि दिल्ली के बाहर दोपहर लड़ाई लड़कर उस दिन की रात दिल्ली के राजमहल में रिपुरक्त का प्राशन करते बिताएंगे, ऐसी जो अंग्रेज सैनिकों को आशा ही नहीं भरे थे, स्वराज्य और स्वधर्म के रक्षणार्थ म्यान में केवल असैनिक लोग ही नहीं भरे थे, स्वराज्य और स्वधर्म के रक्षणार्थ म्यान से बाहर निकली तलवारें भी सिद्धांतनिष्ठा के संकल्प के साथ उस प्राचीर पर बीच-बीच में झलकती हैं, यह अप्रिय सत्य अंग्रेजों की नजर में इस लड़ाई ने ला दिया। इस लड़ाई में अंग्रेजों के एक सौ चौंतीस लोग घायल हुए तथा चार अधिकारी और सैंतालीस लोग मारे गए। परंतु इन सब मृतकों में अंग्रेजी लश्कर में दुःख और 1857 का स्वातंत्र्य समर - 123