भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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ओ हुतात्माओं ! स्वतंत्रता संग्राम आरंभ हो एक बार पिता से पुत्र को पहुंचे बार-बार भले हो पराजय यदा-कदा पर मिले विजय हर बार। आज 10 मई है। 1857 के स्मरणीय वर्ष में आज के दिवस ही, ओ हुतात्माओ! आपके द्वारा भारतवर्ष की रणभूमि में स्वतंत्रता संग्राम के प्रथम अभियान का सूत्रपात किया गया था। अपनी पतनकारी दासता के भाव से जाग्रत हो हमारी मातृभूमि ने अपना खड्ग निकाल लिया था और बेड़ियों को भंग करते हुए अपनी मुक्ति और सम्मान हेतु प्रथम प्रहार किया था। आज ही के दिवस 'मारो फिरंगी को' का रणघोष कोटि-कोटी कंठों से गूंज उठा था। आज ही के दिवस मेरठ के सिपाहियों ने भयानक विद्रोह में शामिल होते हुए दिल्ली की ओर कूच किया था और सूर्य के प्रकाश में झिलमिलाते यमुना जल के दर्शन किए थे, और उन ऐतिहासिक पलों को आत्मसात् किया था तथा प्राचीन युग का अवसान कर नए युग का उदय किया था और "एक ही पल में अपने नेता, अपने ध्वज तथा एक कारण को प्राप्त कर लिया था और सैनिक विद्रोह को एक राष्ट्रीय व धार्मिक संग्राम में परिवर्तित कर दिया था।" ओ हुतात्माओ! समस्त सम्मान आपको प्राप्त हों, क्योंकि जाति के संरक्षण व सम्मान के लिए आपने उस समय क्रांति की कठोर अग्निपरीक्षा को सहन किया जब इस पावन भूमि के धर्मों पर बलात् व कुटिलतापूर्ण धर्मांतरण का संकट छा रहा था। जब पाखंडी ने अपने मित्रवत् आवरण को उतार फेंका था और विश्वासघाती शत्रु के घृणित रूप में नग्न खड़ा हो गया था तथा संधियों का उल्लंघन करने लगा था, मुकुटों को भंग करने लगा था और हमारी कृपालू मातृभूमि का उसकी निष्ठा के लिए उपहास करने लगा था, जिससे उसने मिथ्याभाषी गोरों के ढोंग का विश्वास किया था। 23