१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
पृष्ठ 7, कुल 418 में से
संदर्भ में पढ़ेंदेशों में यात्रा, प्रकाशन और प्रकाशन पूर्व प्रतिबंध की रोमांचकारी कहानी हमें 10 जनवरी, 1947 को बंबई से प्रकाशित प्रथम अधिकृत संस्करण में मराठी साप्ताहिक ‘अग्रणी’ के संपादक श्री जी.एम.जोशी की कलम से तथा दिल्ली स्थित राष्ट्रीय अभिलेखागार में सुरक्षित फाइलों में मिलती है। जी.एम.जोशी लिखते हैं कि "सावरकर ने अपनी पहली रचना ‘मेजिनी का चरित्र’ की तरह ही इस पांडुलिपि को भी प्रकाशन हेतु अपने बड़े भाई बाबाराव सावरकर के पास नासिक भेज दिया। ब्रिटिश गुप्तचर एजेंसियां उस पांडुलिपि की खोज में लगी हुई थी। सावरकर ने पेरिस से प्रकाशित अपने उद्देश्यों को स्पष्ट किया। उन्होंने लिखा कि वे इस पुस्तक के द्वारा देशवासियों के मन में मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए द्वितीय निर्णायक युद्ध का संकल्प जगाना चाहते हैं। वे उस इतिहास के माध्यम व दिशा-निर्देश भी करना चाहते हैं। पूरे भारत में स्वतंत्रता समर के लिए संगठन के कार्यक्रम व दिशा-निर्देश भी करना चाहते हैं। पूरे भारत में स्वतंत्रता की अलख जगाने का इससे अधिक प्रभावी व सफल माध्यम क्या हो सकता है कि उनके समाने उस क्रांतियुद्ध, जो निकट भूत में घटा था और जिसकी याद अभी ताजा है, का शुद्ध इतिहास प्रस्तुत कर दिया जाए। स्वाभाविक ही, ऐसा ज्वलनशील इतिहास ग्रंथ ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के लिए भारी डर का कारण बन गया था। उन्हें कहीं से भनक लगी कि मूल ग्रंथ मराठी भाषा में लिखा गया है और भारत में कहीं उसे छापा जा रहा है। बंबई प्रांत ग्रंथ मराठी भाषा में लिखा गया है और भारत में कहीं उसे छापा जा रहा है। बंबई प्रांत की पुलिस ने महाराष्ट्र के सभी प्रमुख छापेखानों पर एक साथ छापा मारा; किंतु सौभाग्य से जिस छापेखाने में वह छप रहा था उसके मालिक, जो स्वयं भी अभिनव भारत पार्टी से जुड़ा था, को अपने किसी पुलिसवाले मित्र से आसन्न छापे की जानकारी मिल गई। अतः छापा पड़ने के पहले ही पांडुलिपि को वहां से हटा दिया गया और उसे लंदन न भेजकर सुरक्षित पेरिस पहुंचा दिया गया। वहां के भारतीय क्रांतिकारियों ने यह सोचकर कि जर्मनी में संस्कृत ग्रंथों की मुद्रण परंपरा होने के कारण वहां देवनागरी लिपि के मराठी ग्रंथ को छपवाना संभव होगा, पांडुलिपि को जर्मनी भेज दिया। किंतु निराशा हाथ लगी और मराठी पांडुलिपि वापस आ गई। अब क्रांतिकारी टोली ने निर्णय किया कि ग्रंथ का जल्दी-से-जल्दी अंग्रेजी भाषा में अनुवाद किया जाए, अतः उसके कई अध्यायों को अलग-अलग व्यक्तियों को अनुवाद के लिए बांट दिया गया। सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी वी.वी.एस.अय्यर के मार्गदर्शन में इंग्लैंड में आई.सी.एस और लॉ की परीक्षा की तैयारी में लगे हुए कुछ मेधावी देशभक्त मराठी छात्रों ने शीघ्रातिशीघ्र मराठी ग्रंथ का अंग्रेजी रूपांतर तैयार कर दिया। अब पुनः समस्या खड़ी हुई कि अंग्रेजी ग्रंथ का मुद्रण कहां से हो? ब्रिटिश गुप्तचर विभाग 10