१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकी सक्रियता के कारण इंग्लैंड के किसी छापेखाने में छपवाना निरापद नहीं था। पेरिस उन दिनों भारतीय क्रांतिकारियों का गढ़ था; किंतु उस समय तक जर्मनी के विरूद्ध फ्रांस और ब्रिटेन का गठबंधन हो चुका था। अतः फ्रांस सरकार का गुप्तचर विभाग भी उन दिनों ब्रिटिश सरकार के दबाव में भारतीय क्रांतिकारियों के पीछे पड़ा हुआ था। जी.एम. जोशी का कहना है कि ‘'क्रांतिकारियों ने किसी प्रकार हॉलैंड के एक छापेखाने को यह ग्रंथ छापने के लिए तैयार कर लिया और ब्रिटिश गुप्तचर विभाग को अंधेरे में रखने के लिए प्रचारित कर दिया कि पुस्तक पेरिस में छप रही है।'' जी.एम. जोशी के अनुसार, 'हॉलैंड में छपने के बाद पुस्तक का पूरा संस्करण क्रांतिकारियों के फ्रांस स्थित ठिकानों पर सुरक्षित पहुंच गया, जहां से उसके वितरण की व्यवस्था की गई।''
अब हम दिल्ली के राष्ट्रीय अभिलेखागार में सुरक्षित फाइलों पर पहुंच जाते हैं। इन फाइलों के अनुसार, न्यू स्कॉटलैंड यार्ड ने 6 नवंबर, 1908 को पुस्तक के छपने की रिपोर्ट ब्रिटिश सरकार को दी, जो तुरंत भारत सरकार को भेजी गई 14 दिसंबर, 1908 के तत्कालीन ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड मिंटों ने आदेश यिा कि पुस्तक के भारत प्रवेश को हमें रोकना होगा। गुप्तचर विभाग के निदेशक ने 18 दिसंबर को लिखा कि निस्संदेह यह पुस्तक बहुत आपत्तिजनक होगी और इसे समुद्र कस्टम्स ऐक्ट की धारा 19 के अंतर्गत प्रतिबंधित करना ठीक होगा और उस पर लेखक के नाम की सही जानकारी प्राप्त करना आवश्यक है। यह जानकारी तभी मिल सकती है, जब एच.ए. स्टुअर्ट नामक अधिकारी ने टिप्पणी लिखी कि अच्छा यह होगा कि हम पोस्ट ऑफिस ऐक्ट के अंतर्गत नोटिस जारी करें। निदेशक, गुप्तचर विभाग सर एडवर्ड हेनरी को इंग्लैंड का गुप्तचर विभाग पुस्तक का सही नाम पता लगाने में असफल रहा। अंतत 11 जनवरी में छपी है।''
इसे कहते हैं अंधेरे में तीर चलाना। भारतीय पोस्ट ऑफिस के महानिदेशक ने सवाल उठाया कि यदि वह पुस्तक मराठी भाषा में है तो बंबई, मध्य प्रांत व राजपुताना सर्किल के डाकखानों में ही उसे रोका जा सकेगा; क्योंकि अन्य प्रांतों में मराठीभाषी कर्मचारी उपलब्ध नहीं हैं। 2 जनवरी 1909 को एक नया सवाल खड़ा हो गया कि अगर वह मराठी पुस्तक जर्मनी से छपकर भारत आ रही है तो उसे समुद्री डाक में ही रोकना होगा; पर काफी सोच-विचार के बाद पोस्ट ऑफिस ऐक्अ के अंतर्गत ही पुस्तक पर
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