अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
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द्वितीय सर्ग
अम्बरीषराजा को नारायण का वर देना
भरद्वाज शृणुष्वाथ रामचन्द्रस्य धीमतः ।। जन्मनः कारणं विप्र इक्ष्वाकुकुलवारिधौ ।। १ ।। सीतायाश्च महादेव्याः पृथिव्यां जन्महेतुकम् । तत्र रामकथामादौ वक्ष्यामि मुनिपुंगव ।। २ ।।
हे भरद्वाज ! इक्ष्वाकुकुलसागरमें जिस प्रकार रामचन्द्रका जन्म हुआ सो आप सुनो ॥ १ ॥ और महादेवी सीताका भी पृथ्वीमें जन्म लेनेका कारण सुनो; हे मुनिश्रेष्ठ ! उसमें प्रथम मैं रामकथा वर्णन करता हूँ ॥ २ ॥
श्रूयतां मुनिशार्दूल अंबरीषकथालयम् । पुरुषोत्तममाहात्म्यं सर्वपापहरं परम् ।। ३ ।। त्रिशंकोर्दयिता भार्या सर्वलक्षणशोभिता । अंबरीषस्य जननी नित्यं शौचसमन्विता ।। ४ ।।
हे मुनिश्रेष्ठ ! अम्बरीषसंबंधी कथानकको आप हमसे श्रवण कीजिये यह पुरुषोत्तम माहात्म्य सब पापका हरनेवाला है ॥ ३ ॥ त्रिशंकुकी प्रिया (भार्या) सब लक्षणोंसे शोभित थी वह अम्बरीषकी जननी नित्य पवित्रतासे युक्त थी ॥ ४ ॥
योगनिद्रां समारूढं शेषपर्यंकशायिनम् । नारायणं महात्मानं ब्रह्मांडकमलोद्भवम् ।। ५ ।। तमसा कालरुद्राख्यं रजसा कनकांडजम् । सत्त्वेन सर्वगं विष्णुं सर्वदेवनमस्कृतम् ।। ६ ।।
योगनिद्रामें आरूढ शेषशय्यापर शयन करनेवाले महात्मा नारायण ब्रह्माण्ड और ब्रह्माके निर्माताको ॥ ५ ॥ जो तमोगुणयुक्त हो कालरुद्र कहाते हैं, रजोगुणसे ब्रह्मारूप होते हैं, सतोगुणसे सबके नमस्कारयोग्य विष्णुरूप होते हैं ॥ ६ ॥
अर्चयामास सततं वाङ्मनःकायवृत्तिभिः । माल्यदामादिकं सर्वं स्वयमेव व्यचीकरत् ।। ७ ।। गंधादिपेषणं चैव धूपद्रव्यादिकं तथा तत्सर्वं कौतुकाविष्टा स्वयमेव चकार सा ।। ८ ।।
उनको वचन मन कर्मसे निरन्तर अर्चना करती थी और माला आदि अपने हाथ लेकर सेवा करती थी ॥ ७ ॥ गंधादिका पेषण धूप दीपादिका करना यह कौतुकाक्रान्त होकर सब आपही करती थी ॥ ८ ॥