भारतकोश
अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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सर्ग ] हिन्दीटीकासहित ( ३३ )

शोकाविष्टेन मनसा संतप्तहृदयेक्षणः ॥ चिन्तामापेदिवांस्तत्र शोकमूर्च्छाकुलांतरः ॥ १३ ॥ ततः क्रोधेन महता ज्जवाल मुनिपुंगवः । लक्ष्मीं शशाप सहसा तद्दासीभिस्तिरस्कृतः ॥ १४ ॥

महाशोकित और हृदयमें सन्तप्त हो शोकसे मूर्च्छित हो विचार करने लगे ॥ १३ ॥ और फिर महाक्रोधसे मुनि प्रज्वलित हो उठे, और उनकी दासियोंसे तिरस्कार होनेके कारण सहसा लक्ष्मीको शाप दिया ॥ १४ ॥

यदहं राक्षसं भावं गृहीत्वा विष्णु कांतया ॥ चेटीभिर्वारितो दूरं वेत्राघातेन ताडितः ॥ १५ ॥ तस्मात्संजायतां लक्ष्मी रक्षसां गर्भसंभवा ॥ यतोऽहं बहिराक्षिप्तश्चेटीभिः सावहेलनम् ॥ १६ ॥

जो कि लक्ष्मीने मुझे राक्षसभावसे ग्रहण किया है और चेटियोंसे निवारित कर वेत्राघात कराया है ॥ १५ ॥ इस कारण यह लक्ष्मी राक्षस गर्भसे उत्पन्न होगी, जो कि, दासियोंने तिरस्कार कर मुझे बाहर निकाल दिया ॥ १६ ॥

हेलया राक्षसी च त्वां बहिः क्षेप्स्यति भूतले ॥ इत्युक्ते नारदेनाथ चकंपे भुवनत्रयम् ॥ १७ ॥ हाहाकारं ततश्चक्रुर्देवगंधर्वदानवाः ॥ नारदो विललापाथ धिग्धिङ् मामिति च ब्रुवन् ॥ १८ ॥

इसी प्रकार तिरस्कार कर राक्षसी तुमको बाहर पृथ्वीपर डालेगी नारदके ऐसा कहनेपर त्रिलोकी कम्पित होगई ॥ १७ ॥ देव गन्धर्व दानव हाहाकार करने लगे, तब क्रोध शान्त होनेपर विलाप कर नारदजी अपनेको धिक्कार देने लगे ॥ १८ ॥

नारायणसभायोगो महालक्ष्मीसमीपतः ॥ अहो तुंबुरुणा प्राप्तो धिङ्मां मूढमचेतनम् ॥ १९ ॥ योऽयं हरेः सन्निकासाद्दूतैर्निर्वासितः कथम् ॥ जीवन्यास्यामि कुत्राहं किं मे तुंबुरुणा कृतम् ॥ २० ॥

कि, नारायणके और महालक्ष्मीके समीपमें तुम्बुरुके सामने तिरस्कार हुआ मुझे धिक्कार है ॥ १९ ॥ जो कि नारायणके सन्मुख दूतोंसे निकाला गया अब मैं जीता कहाँ जाऊँ मुझे तुम्बुरुने क्या कर दिया ॥ २० ॥

रोदमानो मुहुर्विद्वान्धिङ्मामिति च चिंतयन् ॥ ततो नारायणो लक्ष्म्याः शापं श्रुत्वा सुदारुणम् ॥ २१ ॥ लक्ष्म्या सह हृषीकेश आजगाम यतो मुनिः ॥ रमां प्रसाद्यं तं विप्रं प्रत्युवाच कृतांजलिः ।२२

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