अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें(३४) अद्भुतरामायण [ षष्ठ-
वह विद्वान् बारंबार रुदन करते अपनेको धिक्कारते विचारने लगे और नारायणने लक्ष्मीका दारुण शाप सुनकर ॥ २१ ॥ लक्ष्मीके सहित नारदजीके समीप आगमन किया और लक्ष्मी नारदजीको प्रसन्न कर हाथ जोड बोली । २२
यदुक्तं भवता मह्यं तत्तथा न तदन्यथा । तत्र किंचित्प्रार्थयामि मुने तत्कृपया कुरु ॥ २३ ॥ आरण्यानां मुनीनां वै स्तोकं स्तोकं च शोणितम् ॥ कलशापूरितं भक्षेद्राक्षसी या च कामतः ॥ २४ ॥
जो अपने मेरे प्रति कहा है वह अन्यथा न होगा, मैं कुछ प्रार्थना करती हूँ आप मुझ पर कृपा करो ॥ २३ ॥ वनके मुनियोंका थोडा थोडा रुधिर कलशेमें भरकर प्राप्त हो जो राक्षसी अपनी इच्छासे उसको भक्षण करे ॥ २४ ॥
तस्या गर्भे भविष्यामि तच्छोणितसमुद्भवा ॥ इत्युक्तं रमया-चिंत्या(संभावान्नौ भवेदिति ॥ २५ ॥ नारदस्तु तथेत्याह अस्याः सर्वं हि दारुणम् ॥ ततो नारायणो देवः प्रोक्तवान्नारदं मुनिम् ॥ २६ ॥
उसीके गर्भसे उस रुधिर द्वारा मैं उत्पन्न हूं। अव लक्ष्मीने इस प्रकार अपने होनेकी प्रार्थना की ॥ २५ ॥ तब नारदने कहा यह सब दारुणता तुम्हारे निमित्त होगी तब नारायणने नारदसे कहा ॥ २६ ॥
नाहं दानेन तपसा नेज्यया नापि तीर्थतः । संतुष्यामि द्विजश्रेष्ठ यथा नाम्नां प्रकीर्तनात् ॥ २७ ॥ गानेन नामगुणयोर्मम सायुज्यमाप्नुयात् ॥ निदर्शनं कौशिकोऽत्र गानान्मल्लोकमाप्तवान् ॥२८॥
मैं दान, तप, इज्या (यज्ञ) तीर्थसे ऐसा प्रसन्न नहीं होता हूं जैसा नामकीर्तनसे होता हूं ॥ २७ ॥ जो मेरे नाम गान करता है वह मेरे सायुज्य लोकको प्राप्त होता है, इसमें उदाहरणरूप कौशिक है जो गानसे मेरे लोकको प्राप्त हुआ है ॥ २८ ॥
मूर्च्छनादियुतं गानं नाम्नामपि मम प्रियम् ॥ तुंबुरुस्तत्प्रभावेण प्रियस्त्वत्तोपि मे द्विज ॥ २९ ॥ मूर्च्छनातालयोंगेन गानेन त्वं तथा भव ॥ उलूकं पश्य गत्वा त्वं यदि गाने मतिस्तव ॥ ३० ॥
मूर्च्छनादियुक्त तालसे जो मेरे नाम गाता है वह मुझे अतिप्रिय है इसीके प्रभावसे तुम्बुरु तुमसे अधिक प्यारा है ॥ २९ ॥ मूर्च्छना तालयोग और गानकर तुम भी इस प्रकारके हो यदि तुम्हारी गानमें मति है तो जाकर उलूकको देखो ॥ ३० ॥