भारतकोश
अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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( ३८ ) अद्भुतरामायण [ षष्ठ-

ताल वीणा लयके सहित नारायणका गुण गाता था, और अपने मनमें महान् स्नेह करता था ॥ ५७ ॥ तब राजाकी आज्ञासे योद्धा वहां आये उन्होंने वह पूजादिकी सामग्री सब नष्ट कर दी ॥ ५८ ॥

ब्राह्मणं च गृहीत्वा ते राज्ञे सम्यङ्‍न्यवेदयन् ॥ ततो राजा द्विजश्रेष्ठं परिभर्त्स्र्य सुदुर्मनाः ॥ ५९ ॥ राज्यान्निर्वासयामास हृत्वा सर्वधनादिकम् ॥ प्रतिमां च हरेश्चैव नापश्यत्स यदृच्छया ॥ ६० ॥

और ब्राह्मणको पकड़कर राजाके पास ले गये, तब राजाने दुःखी हो उस ब्राह्मणको बहुत झिडका ॥ ५९ ॥ और सब धनादि लेकर उसे राज्यसे निकाल दिया और कभी उसने अपनी इच्छासे नारायणकी मूर्तिका दर्शन न किया । ६० ।

ततः कालेन महता कालधर्ममुपेयिवान् ॥ लोकान्तरमनुप्राप्य उलूकं देहमाश्रितः ॥ ६१ ॥ सर्वत्र गच्छमानोपि भक्ष्यं किंचिन्न चाप्तवान् ॥ क्षुधार्तश्च सदा खिन्नो यममाह सुदुःखितः ६२ ॥

फिर कुछ समयके उपरान्त वह कालधर्मको प्राप्त हुआ लोकान्तरको प्राप्त होकर उलूक हो गया ॥ ६१ ॥ सर्वत्र जानेपरभी उसको कहीं कुछ भक्ष्य प्राप्त न हुआ और क्षुधासे खिन्न हो यमराजसे उसने कहा ॥ ६२ ॥

क्षुत्पीडा वर्तते देव दुर्गतस्य सदा मम ॥ मया पापं कृतं किंवा किं करिष्यामि वै यम ॥ ६३ ॥ ततस्तं धर्मराट् प्राह धर्माधर्मप्रदर्शकः ॥ त्वया हि सुमहत्पापं कृतमज्ञानतो नृप ॥ ६४ ॥

हे देव ! मुझे बडी क्षुधा है और सदा मेरी दुर्गति है हे यम ! मैंने क्या पाप किये हैं और अब मैं क्या करूं ॥ ६३ ॥ तब धर्माधर्मके दिखानेवाले यमराज उससे बोले, हे राजन् ! अज्ञानसे तुमने बडे पाप किये हैं ॥ ६४ ॥

हरिमित्रं प्रति तदा वासुदेवपरायणम् ॥ हरिमित्रे कृतं पापं वासुदेवार्चनादिषु ॥ ६५ ॥ तेन पापेन संप्राप्तः क्षुद्बोधस्त्वां सदा नृप ॥ दानयज्ञादिकं सर्वं प्रनष्टं ते नराधिप ॥ ६६ ॥

हरिमित्र वासुदेवपरायण हरिमित्रमें आपने पापाचरण किया है ॥ ६५ ॥ हे राजन् उस पापसे आपको सदा क्षुधाकी प्राप्ति हुई है हे राजन् ! इसी कारण तुम्हारे दानयज्ञादि सब नष्ट होगये हैं ॥ ६६ ॥

गीतनाट्यलयोपेतं गायमानं सदा हरिम् ॥ हरिमित्रं समाहूय हृतवानसि तद्धनम् ॥ ६७ ॥ उपहारदिकं सर्वं वासुदेवस्य सन्निधौ ॥ तव भृत्याः समाहृत्य पापं चक्रुस्तवाज्ञया ॥ ६८ ॥

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