अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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अध्यात्मरामायण
माहात्म्य
रामं विश्वमयं वन्दे रामं वन्दे रघूद्वहम् । रामं विप्रवरं वन्दे रामं श्यामाग्रजं भजे ॥
यस्य वागांशुतश्च्यूतं रम्यं रामायणामृतम् । शैलजासेवितं वन्दे तं शिवं सोमरूपिणम् ॥
सच्चिदानन्दसन्दोहं भक्तिभूतिविभूषणम् । पूर्णानन्दमहं वन्दे सद्गुरुं शङ्करं स्वयं ॥
अज्ञानध्वान्तसंहर्त्री ज्ञानालोकविलासिनी । चन्द्रचूडवचश्चन्द्रचन्द्रिकेयं विराजते ॥
अप्रमेयत्रयातीतनिर्मलज्ञानमूर्तये ।
मनोगिरां विदूराय दक्षिणामूर्तये नमः ॥ १ ॥
जो प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे परे, त्रिगुणातीत, मलहीन, ज्ञानस्वरूप और मन, वाणी आदिके अविषय हैं उन दक्षिणामूर्ति भगवान् (सदाशिव) को नमस्कार है ॥ १ ॥
सूत उवाच
कदाचिन्नारदो योगी परानुग्रहवाञ्छया ।
पर्यटन्सकलाँल्लोकान्सत्यलोकमुपागमत् ॥ २ ॥
तत्र दृष्ट्वा मूर्तिमद्भिश्छन्दोभिः परिवेष्टितम् ।
बालार्कप्रभया सम्यग्भासयन्तं सभागृहम् ॥ ३ ॥
मार्कण्डेयादिमुनिभिः स्तूयमानं मुहुर्मुहुः ।
सर्वार्थगोचरज्ञानं सरस्वत्या समन्वितम् ॥ ४ ॥
चतुर्मुखं जगन्नाथं भक्ताभीष्टफलप्रदम् ।
प्रणम्य दण्डवद्भक्त्या तुष्टाव मुनिपुङ्गवः ॥ ५ ॥
**श्रीसूतजी बोले—**एक समय योगिराज नारदजी दूसरोंपर कृपा करनेके लिये समस्त लोकोंमें विचरते हुए सत्यलोकमें पहुँचे ॥ २ ॥ वहाँ मूर्तिमान् वेदोंसे घिरे हुए, अपनी बालसूर्यके समान प्रभासे सभाभवनको पूर्णतया देदीप्यमान करते हुए, मार्कण्डेय आदि मुनिजनोंसे बारम्बार स्तुति किये जाते हुए, सम्पूर्ण पदार्थोंका ज्ञान रखनेवाले और भक्तोंको इच्छित फल देनेवाले सरस्वतीयुक्त जगत्पति ब्रह्माजीको देखकर मुनिश्रेष्ठ नारदजीने उन्हें साष्टांग प्रणाम किया और भक्तिभावसे स्तुति की ॥ ३–५ ॥
सन्तुष्टस्तं मुनिं प्राह स्वयम्भूर्वैष्णवोत्तम् ।
किं प्रष्टुकामस्त्वमसि तद्गदिष्यामि ते मुने ॥ ६ ॥
तब स्वयम्भू ब्रह्माजीने प्रसन्न होकर वैष्णवाग्रणी श्रीनारदजीसे कहा—"मुने ! तुम क्या पूछना चाहते हो ? मैं तुमसे वह सब कहूँगा" ॥ ६ ॥
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य मुनिर्ब्रह्माणमब्रवीत् ।
त्वत्तः श्रुतं मया सर्वं पूर्वमेव शुभाशुभम् ॥ ७ ॥
इदानीमेकमेवास्ति श्रोतव्यं सुरसत्तम ।
तद्रहस्यमपि ब्रूहि यदि तेऽनुग्रहो मयि ॥ ८ ॥
ब्रह्माजीके ये वचन सुनकर नारदजीने उनसे कहा, "हे देवश्रेष्ठ ! शुभाशुभ कर्मोंका वर्णन तो मैं आपसे पहले ही सुन चुका हूँ। अब मुझे एक ही बात और सुननी है; यदि मुझपर आपकी कृपा है तो गोपनीय होनेपर भी वह सुनाइये ॥ ७-८ ॥ अब घोर कलियुगके आनेपर