भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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मा अध्यात्मरामायण


प्राप्ते कलियुगे घोरे नराः पुण्यविवर्जिताः ।
दुराचाररताः सर्वे सत्यवार्तापराङ्मुखाः ॥ ९ ॥

मनुष्य पुण्यकर्म छोड़ देंगे और सत्यभाषणसे विमुख होकर दुराचारमें प्रवृत्त हो जायँगे ॥ ९ ॥


परापवादनिरताः परद्रव्याभिलाषिणः ।
परस्त्रीसक्तमनसः परहिंसापरायणाः ॥ १० ॥

वे दूसरोंकी निन्दामें तत्पर रहेंगे, दूसरोंके धनकी इच्छा करेंगे, परस्त्रीमें चित्त लगावेंगे और परायी हिंसा करेंगे ॥ १० ॥


देहात्मदृष्टयो मूढा नास्तिकाः पशुबुद्धयः ।
मातापितृकृतद्वेषाः स्त्रीदेवाः कामकिङ्कराः ॥ ११ ॥

ये मूढ़ देहमें ही आत्मबुद्धि करेंगे, शास्त्र और ईश्वरसे विमुख होंगे, उनकी बुद्धि पशुओंके समान होगी और वे कामके गुलाम होकर स्त्रीके भक्त और माता-पिताके द्रोही बनेंगे ॥ ११ ॥


विप्रा लोभग्रहग्रस्ता वेदविक्रयजीविनः ।
धनार्जनार्थमभ्यस्तविद्या मदविमोहिताः ॥ १२ ॥

ब्राह्मणगण लोभरूपी ग्रहसे ग्रस्त और वेद बेचकर अपनी आजीविका चलानेवाले होंगे, वे धनोपार्जनके लिये ही विद्याभ्यास करेंगे और (विद्या तथा ब्राह्मणत्वके) मदमे उन्मत्त हो जायँगे ॥ १२ ॥


त्यक्तस्वजातिकर्माणः प्रायशः परवञ्चकाः ।
क्षत्रियाश्च तथा वैश्याः स्वधर्मत्यागशीलिनः ॥ १३ ॥

क्षत्रिय और वैश्यगण भी स्वधर्मको त्यागनेवाले तथा अपने जाति-कर्मोंको छोड़कर प्रायः दूसरोंको ठगनेवाले ही होंगे ॥ १३ ॥


तद्वच्छूद्राश्च ये केचिद्ब्राह्मणाचारतत्पराः ।
स्त्रियश्च प्रायशो भ्रष्टा भर्तृवज्ञाननिर्भयाः ॥ १४ ॥

इसी प्रकार जो शूद्र होंगे वे भी ब्राह्मणोंके आचारमें तत्पर हो जायँगे तथा स्त्रियाँ प्रायः भ्रष्टाचारिणी और अपने पतिके अपमान करनेमें निडर होंगी ॥ १४ ॥


श्वशुरद्रोहकारिण्यो भविष्यन्ति न संशयः ।
एतेषां नष्टबुद्धीनां परलोकः कथं भवेत् ॥ १५ ॥

निस्सन्देह वे अपने सास-ससुरोंसे द्रोह करेंगी। इन नष्ट-बुद्धियोंका परलोक किस प्रकार सुधरेगा ? ॥ १५ ॥


इति चिन्ताकुलं चित्तं जायते मम सन्ततम् ।
लघूपायेन येनैषां परलोकगतिर्भवेत् ।
तमुपायमुपारूढि सर्वं वेत्ति यतो भवान् ॥ १६ ॥

इस चिन्तासे मेरा चित्त निरन्तर व्याकुल रहता है। जिस सुगम उपायसे इनका परलोक सुधर सकता हो वह आप मुझे बतलाइये, क्योंकि आप सभी कुछ जानते हैं" ॥ १६ ॥


इत्युपर्षेर्वाक्यमाकर्ण्य प्रत्युवाचाम्बुजासनः ।
साधु पृष्टं त्वया साधो वक्ष्ये तच्छृणु सादरम् ॥ १७ ॥

देवर्षि नारदजीके ये वचन सुनकर कमलासन ब्रह्माजी बोले—"हे साधो ! तुमने बहुत अच्छी बात पूछी है। मैं उसे बतलाता हूँ, तुम श्रद्धापूर्वक सुनो ॥ १७ ॥


पुरा त्रिपुरहन्तारं पार्वती भक्तवत्सला ।
श्रीरामतत्त्वं जिज्ञासुः पप्रच्छ विनयान्विता ॥ १८ ॥

"पूर्वकालमें भक्तवत्सला पार्वतीजीने श्रीराम-तत्त्वकी जिज्ञासासे त्रिपुर-विनाशक भगवान् शंकरसे विनयपूर्वक प्रश्न किया था ॥ १८ ॥


प्रियायै गिरिशस्तस्यै गूढं व्याख्यातवान्स्वयम् ।
पुराणोत्तममध्यात्मरामायणमिति स्मृतम् ॥ १९ ॥

तब अपनी प्रियासे श्रीमहादेवजीने जिस गूढ़ रहस्यका वर्णन किया था वह उत्तम पुराण अध्यात्मरामायणके नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ १९ ॥


तत्पार्वती जगद्धात्री पूजयित्वा दिवानिशम् ।
आलोचयन्ती स्वानन्दमग्ना तिष्ठति साम्प्रतम् ॥ २० ॥

अब जगज्जननी पार्वतीजी उसका पूजन कर रात-दिन उसीका मनन करती आत्मानन्दमें मग्न रहती हैं ॥ २० ॥


प्रचरिष्यति तल्लोके प्राण्यदृष्टवशाद्यदा ।
तस्याध्ययनमात्रेण जना यास्यन्ति सद्गतिम् ॥ २१ ॥

जिस समय प्राणियोंके सौभाग्यसे उसका लोकमें प्रचार होगा उस समय उसके अध्ययनमात्रसे लोग शुभगति प्राप्त करेंगे