भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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माहात्म्य
तावद्विजृम्भते पापं ब्रह्महत्यापुरःसरम् ।<br>यावज्जगति नाध्यात्मरामायणमुदेष्यति ॥२२॥॥२१॥ संसारमें ब्रह्म-हत्यादि पाप तभीतक रहेंगे जबतक अध्यात्मरामायणका प्रादुर्भाव नहीं होगा ॥ २२ ॥
तावत्कलिमहोत्साहो निःशङ्कं सम्प्रवर्तते ।<br>यावज्जगति नाध्यात्मरामायणमुदेष्यति ॥२३॥कलियुगका महान् उत्साह तभीतक निःशंक रहेगा जबतक संसारमें अध्यात्मरामायणका उदय न होगा ॥ २३ ॥
तावद्यमभटाः शूराः सञ्चरिष्यन्ति निर्भयाः ।<br>यावज्जगति नाध्यात्मरामायणमुदेष्यति ॥२४॥यमराजके शूरवीर दूत तभीतक निर्भय विचरते रहेंगे जबतक जगत्में अध्यात्मरामायण प्रकट नहीं होगी ॥ २४ ॥
तावत्सर्वाणि शास्त्राणि विवदन्ते परस्परम् ॥२५॥<br>तावत्स्वरूपं रामस्य दुर्बोधं महतामपि ।<br>यावज्जगति नाध्यात्मरामायणमुदेष्यति ॥२६॥और सम्पूर्ण शास्त्रोंमें परस्पर विवाद तभीतक रहेगा तथा महापुरुषोंको भी भगवान् रामका स्वरूप तभीतक दुर्बोध रहेगा जबतक संसारमें अध्यात्मरामायणका प्रकाश नहीं होगा ॥ २५-२६ ॥
अध्यात्मरामायणसङ्कीर्तनश्रवणादिजम् ।<br>फलं वक्तुं न शक्नोमि कार्त्स्न्येन मुनिसत्तम ॥२७॥<br>तथाऽपि तस्य माहात्म्यं वक्ष्ये किञ्चित्तवानघ।<br>शृणु चित्तं समाधाय शिवेनोक्तं पुरा मम ॥२८॥"हे मुनिश्रेष्ठ ! मैं अध्यात्मरामायणके कीर्तन और श्रवणसे होनेवाले फलका पूर्णतया वर्णन नहीं कर सकता, तथापि हे अनघ ! मैं तुम्हें उसका थोड़ा-सा माहात्म्य सुनाता हूँ। इसे पूर्वकालमें मुझसे शिवजीने कहा था; तुम सावधान होकर सुनो—॥२७-२८॥
अध्यात्मरामायणतः श्लोकं श्लोकार्धमेव वा ।<br>यः पठेद्भक्तिसंयुक्तः स पापान्मुच्यते क्षणात्॥२९॥जो पुरुष अध्यात्मरामायणका एक अथवा आधा श्लोक भी भक्तिपूर्वक पढ़ता है वह तत्क्षण पापमुक्त हो जाता है ॥२९॥
यस्तु प्रत्यहमध्यात्मरामायणमनन्यधीः ।<br>यथाशक्ति वदेद्भक्त्या स जीवन्मुक्त उच्यते ॥३०॥जो इस अध्यात्मरामायणको नित्यप्रति अनन्य बुद्धिसे भक्तिपूर्वक यथाशक्ति सुनाता है वह जीवन्मुक्त कहलाता है ॥३०॥
यो भक्त्यार्चयतेऽध्यात्मरामायणमतन्द्रितः।<br>दिनेदिनेऽश्वमेधस्य फलं तस्य भवेन्मुने ॥३१॥हे मुने ! जो पुरुष आलस्य छोड़कर भक्तिभावसे प्रतिदिन अध्यात्मरामायणका पूजन करता है उसे अश्वमेधयज्ञका फल मिलता है ॥ ३१ ॥
यदृच्छयापि योऽध्यात्मरामायणमनादरात्।<br>अन्यतः शृणुयान्मर्त्यः सोऽपि मुच्येत पातकात् ३२जो मनुष्य दूसरोंसे अनियमपूर्वक अनादरसे भी अध्यात्मरामायण श्रवण करता है वह भी पातकसे छूट जाता है ॥ ३२ ॥
नमस्करोति योऽध्यात्मरामायणमदूरतः ।<br>सर्वदेवार्चनफलं स प्राप्नोति न संशयः ॥३३॥जो कोई अध्यात्मरामायणके निकट जाकर उसे नमस्कार करता है वह समस्त देवताओंकी पूजाका फल पाता है—इसमें सन्देह नहीं ॥ ३३ ॥
लिखित्वा पुस्तकेऽध्यात्मरामायणमशेषतः ।<br>यो दद्याद्रामभक्तेभ्यस्तस्य पुण्यफलं शृणु ॥३४॥"जो पुरुष अध्यात्मरामायणकी सम्पूर्ण पुस्तक लिखकर राम-भक्तोंको देता है उसे जो पुण्य होता है उसका फल सुनो ॥३४॥
अधीतेषु च वेदेषु शास्त्रेषु व्याकृतेषु च ।<br>यत्फलं दुर्लभं लोके तत्फलं तस्य सम्भवेत् ॥३५॥उसे वह फल मिलता है जो वेदोंके पढ़नेसे और शास्त्रोंकी व्याख्या करनेसे भी संसारमें दुर्लभ है ॥ ३५ ॥
एकादशीदिनेऽध्यात्मरामायणमुपोषितः ।<br>यो रामभक्तः सदसि व्याकरोति नरोत्तमः ॥३६॥जो नरश्रेष्ठ रामभक्त एकादशीको उपवास करके सभामें अध्यात्मरामायणकी व्याख्या करता है, हे वैष्णवश्रेष्ठ ! उसके