अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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न अध्यात्मरामायण
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तस्य पुण्यफलं वक्ष्ये शृणु वैष्णवसत्तम ।<br>प्रत्यक्षरं तु गायत्रीपुरश्चर्याफलं भवेत् ॥३७॥ | पुण्यका फल बतलाता हूँ, सुनो। उसे एक-एक अक्षर के पढ़नेमें गायत्रीके पुरश्चरणका फल मिलता है ॥३६-३७॥ |
| उपवासव्रतं कृत्वा श्रीरामनवमीदिने ।<br>रात्रौ जागरितोऽध्यात्मरामायणमनन्यधीः।<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि तस्य पुण्यं वदाम्यहम् ॥३८॥ | जो पुरुष रामनवमीके दिन निराहार रहकर और फिर रात्रिको जागरण कर अनन्य बुद्धि-से अध्यात्मरामायणको पढ़ता या सुनता है, अब मैं उसका पुण्य बतलाता हूँ ॥३८॥ |
| कुरुक्षेत्रादिनिखिलपुण्यतीर्थेष्वनेकंशः ।<br>आत्मतुल्यं धनं सूर्यग्रहणे सर्वतोमुखे ॥३९॥<br>विप्रेभ्यो व्यासुल्येभ्यो दत्त्वा यत्फलमश्नुते ।<br>तत्फलं सम्भवेत्तस्य सत्यं सत्यं न संशयः ॥४०॥ | कुरुक्षेत्रादि सम्पूर्ण पवित्र तीर्थोंमें सर्वग्रस्त सूर्यग्रहणके समय अनेकों बार व्यासजीके समान ब्राह्मणोंको अपने बराबर धन देनेसे जो फल होता है उसे वही फल मिलता है; इसमें कोई सन्देह नहीं, यह सर्वथा सत्य है, सर्वथा सत्य है ॥३९-४०॥ |
| यो गायते मुदाऽध्यात्मरामायणमहर्निशम् ।<br>आज्ञां तस्य प्रतीक्षन्ते देवा इन्द्रपुरोगमाः ॥४१॥ | जो मनुष्य अहर्निश प्रसन्नचित्तसे अध्यात्मरामायणका गान करता है उसकी आज्ञाकी इन्द्रादि देवगण प्रतीक्षा किया करते हैं ॥४१॥ |
| पठन्प्रत्यहमध्यात्मरामायणमनुव्रतः ।<br>यद्यत्करोति तत्कर्म ततः कोटिगुणं भवेत् ॥४२॥ | अध्यात्मरामायणका नित्यप्रति नियमपूर्वक पाठ करने-से मनुष्य जो कुछ पुण्य-कर्म करता है वह करोड़-गुना हो जाता है ॥४२॥ |
| तत्र श्रीरामहृदयं यः पठेत्सुसमाहितः ।<br>स ब्रह्मघ्नोऽपि पूतात्मा त्रिभिरेव दिनैर्भवेत् ॥४३॥ | “इस (अध्यात्मरामायण) मेंसे जो पुरुष खूब समाहित होकर श्रीरामहृदयका पाठ करता है वह ब्रह्महत्यारा भी हो तो भी तीन दिनमें ही पवित्र हो जाता है ॥४३॥ |
| श्रीरामहृदयं यस्तु हनूमत्प्रतिमान्तिके ।<br>त्रिः पठेत्प्रत्यहं मौनी स सर्वेप्सितभाग्भवेत् ॥४४॥ | जो पुरुष हनुमान्जीकी प्रतिमाके समीप प्रतिदिन तीन बार मौन होकर श्रीरामहृदयका पाठ करता है वह समस्त इच्छित फल प्राप्त करता है ॥४४॥ |
| पठन् श्रीरामहृदयं तुलस्यश्वत्थयोर्यदि ।<br>प्रत्यक्षरं प्रकुर्वीत ब्रह्महत्यानिवर्तनम् ॥४५॥ | और यदि कोई पुरुष तुलसी या पीपलके निकट श्रीराम-हृदयका पाठ करे तो वह एक-एक अक्षरपर (अपनी) ब्रह्महत्या (जैसे पापों) को दूर कर देता है ॥४५॥ |
| श्रीरामगीतामाहात्म्यं कृत्स्नं जानाति शङ्करः ।<br>तदर्धं गिरिजा वेत्ति तदर्धं वेद्म्यहं मुने ॥४६॥ | “हे मुने ! श्रीरामगीताका माहात्म्य पूरा-पूरा तो श्रीमहादेवजी ही जानते हैं; उनसे आधा पार्वतीजी जानती हैं और उनसे भी आधा मैं जानता हूँ ॥४६॥ |
| तत्ते किञ्चित्प्रवक्ष्यामि कृत्स्नं वक्तुं न शक्यते ।<br>यज्ज्ञात्वा तत्क्षणालोकश्चित्तशुद्धिमवाप्नुयात्।४७। | सो उसे पूरा कह भी नहीं सकता, उसमेंसे थोड़ा-सा तुम्हें सुनाता हूँ जिसके जाननेमात्रसे चित्त तत्काल शुद्ध हो जाता है ॥४७॥ |
| श्रीरामगीता यत्पापं न नाशयति नारद ।<br>तन्न नश्यति तीर्थादौ लोके क्वापि कदाचन ।<br>तन्न पश्याम्यहं लोके मार्गमाणोऽपि सर्वदा ॥४८॥ | हे नारद ! जिस पापको श्रीरामगीताने नष्ट नहीं किया वह संसारमें कभी किसी तीर्थादिसे भी नष्ट नहीं हो सकता, मैं सदा ढूँढ़नेपर भी उस पापको नहीं देख पाता ॥४८॥ |
| रामेणोपनिषत्सिन्धुमुन्मथ्योत्पादितां मुदा । | जिस गीतामृतको भगवान् रामने उपनिषत्सागरका |