भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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१३२अध्यात्मरामायण[सर्ग ७

हा लक्ष्मणेति वचनं भ्रातुस्ते न शृणोषि किम् ।
तामाह लक्ष्मणो देवि रामवाक्यं न तद्भवेत् ॥ २९ ॥
यः कश्चिद्राक्षसो देवि म्रियमाणोऽब्रवीद्वचः ।
रामस्त्रैलोक्यमपि यः क्रुद्धो नाशयति क्षणात् ॥ ३० ॥
स कथं दीनवचनं भाषतेऽमरपूजितः ।
क्रुद्धा लक्ष्मणमालोक्य सीता वाष्पविलोचना ॥ ३१ ॥
प्राह लक्ष्मण दुर्बुद्धे भ्रातुर्व्यसनमिच्छसि ।
प्रेषितो भरतेनैव रामनाशाभिकाङ्क्षिणा ॥ ३२ ॥
मां नेतुमागतोऽसि त्वं रामनाशे उपस्थिते ।
न प्राप्स्यसे त्वं मामद्य पश्य प्राणांस्त्यजाम्यहम् ॥
न जानातीदृशं रामस्त्वां भार्याहरणोद्यतम् ।
रामादन्यं न स्पृशामि त्वां वा भरतमेव वा ॥ ३४ ॥

इत्युक्त्वा वध्यमाना सा स्वबाहुभ्यां रुरोद ह ।
तच्छ्रुत्वा लक्ष्मणः कर्णौ पिधायातीव दुःखितः ३५
मामेवं भाषसे चण्डि धिक् त्वां नाशमुपैष्यसि ।
इत्युक्त्वा वनदेवीभ्यः समर्प्य जनकात्मजाम् ॥ ३६ ॥
ययौ दुःखादतिसंविग्नो राममेव शनैः शनैः ।
ततोऽन्तरं समालोक्य रावणो भिक्षुवेषधृक् ॥ ३७ ॥
सीतासमीपमगमत्स्फुरद्दण्डकमण्डलुः ।
सीता तमवलोक्याशु नत्वा सम्पूज्य भक्तितः । ३८ ।
कन्दमूलफलादीनि दत्त्वा स्वागतमब्रवीत् ।
मुने भुङ्क्ष्व फलादीनि विश्रमस्व यथासुखम् ॥ ३९ ॥
इदानीमेव भर्ता मे ह्यागमिष्यति ते प्रियम् ।
करिष्यति विशेषेण तिष्ठ त्वं यदि रोचते ॥ ४० ॥


हिन्दी अनुवाद:

तुम अपने भाईका 'हा लक्ष्मण' यह वाक्य नहीं सुनते ?"

लक्ष्मणजीने कहा—"देवि ! यह वाक्य श्रीरामचन्द्रजीका नहीं है ॥ २९ ॥ किसी राक्षसने मरते-मरते ये वचन कहे हैं । जो रामजी क्रोधित होनेपर एक क्षणमें सम्पूर्ण त्रिलोकीको भी नष्ट कर सकते हैं ॥ ३० ॥ वे देववन्दित प्रभु भला ऐसा दीन-वचन कैसे बोल सकते हैं ?"

तब सीताजीने नेत्रोंमें जल भरकर क्रोधपूर्वक लक्ष्मणजीकी ओर देखते हुए कहा—"रे लक्ष्मण ! क्या तू अपने भाईको विपत्तिमें पड़े देखना चाहता है ? अरे दुर्बुद्धे ! मालूम होता है, तुझे रामका नाश चाहनेवाले भरतने ही भेजा है ॥ ३१-३२ ॥ क्या तू रामके नष्ट हो जानेपर मुझे ले जानेके लिये ही आया है, किन्तु तू मुझे पा न सकेगा । देख मैं अभी प्राण त्याग किये देती हूँ ॥ ३३ ॥ राम तुझे इस प्रकार स्त्रीहरणके लिये उद्यत नहीं जानते थे । रामके अतिरिक्त मैं भरत या तुझे किसीको भी नहीं छू सकती" ॥ ३४ ॥

ऐसा कहकर वे अपनी भुजाओंसे छाती पीटती हुई रोने लगीं । उनके ऐसे कठोर शब्द सुन लक्ष्मणजीने अति दुःखित हो अपने दोनों कान मूँद लिये और कहा—"हे चण्डि ! तुम्हें धिक्कार है, तुम मुझे ऐसी बातें कह रही हो ! इससे तुम नष्ट हो जाओगी ।" ऐसा कह लक्ष्मणजी सीताको वनदेवियोंको सौंपकर दुःखसे अत्यन्त खिन्न हो धीरे-धीरे रामके पास चले ।

इसी समय सूना देखकर रावण भिक्षुका वेष बना दण्ड-कमण्डलु घुमाता हुआ सीताके पास आया । सीताने उसे देखकर तुरन्त ही प्रणाम किया और भक्तिपूर्वक उसका पूजन कर कन्द-मूल-फल आदि देकर स्वागत करते हुए कहा—"हे मुने ! ये फल आदि पाकर सुखपूर्वक विश्राम कीजिये । अभी थोड़ी देरमें ही मेरे पतिदेव आते होंगे । यदि आपकी इच्छा हो तो कुछ देर ठहरिये । वे आपका कुछ विशेष सत्कार कर सकेंगे" ॥ ३५-४० ॥