भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ७ ]अरण्यकाण्डे१३३
भिक्षुरुवाच<br>का त्वं कमलपत्राक्षि को वा भर्ता तवानघे ।<br>किमर्थमत्र ते वासो वने राक्षससेविते ।<br>ब्रूहि भद्रे ततः सर्वं स्ववृत्तान्तं निवेदये ॥४१॥भिक्षु बोला— हे कमलोचने ! तुम कौन हो ? तुम्हारे पति कौन हैं ? हे अनघे ! इस राक्षससेवित वनमें तुम क्यों रहती हो ? हे कल्याणि ! ये सब बातें बताओ, तब मैं भी तुम्हें अपना सारा वृत्तान्त सुनाऊँगा ॥४१॥
सीतोवाच<br>अयोध्याधिपतिः श्रीमान् राजा दशरथो महान् ।<br>तस्य ज्येष्ठः सुतो रामः सर्वलक्षणलक्षितः ॥४२॥<br>तस्याहं धर्मतः पत्नी सीता जनकनन्दिनी ।<br>तस्य भ्राता कनीयांश्च लक्ष्मणो भ्रातृवत्सलः ॥४३॥<br>पितुराज्ञां पुरस्कृत्य दण्डके वस्तुमागतः ।<br>चतुर्दश समास्त्वां तु ज्ञातुमिच्छामि मे वद ॥४४॥सीताजी बोलीं— हे भिक्षो ! श्रीमान् महाराज दशरथ अयोध्याके राजा थे, उनके ज्येष्ठ पुत्र सर्व-सुलक्षणसम्पन्न राम हैं ॥४२॥ मैं जनकनन्दिनी सीता उन्हींकी धर्मपत्नी हूँ । उनका छोटा भाई लक्ष्मण है । वह अपने भाईका अत्यन्त स्नेही है ॥४३॥ (हम दोनोंके साथ) श्रीरामचन्द्रजी पिताकी आज्ञासे चौदह वर्ष दण्डकारण्यमें रहनेके लिये आये हैं । अब मैं तुम्हारे विषयमें जानना चाहती हूँ, तुम भी मुझे अपना परिचय दो ॥४४॥
भिक्षुरुवाच<br>पौलस्त्यतनयोऽहं तु रावणो राक्षसाधिपः ।<br>त्वत्कामपरितप्तोऽहं त्वां नेतुं पुरमागतः ॥४५॥<br>मुनिवेषेण रामेण किं करिष्यसि मां भज ।<br>भुङ्क्ष्व भोगान्मया सार्धं त्यज दुःखं वनोद्भवम् ४६भिक्षु बोला— मैं पुलस्त्यनन्दन विश्रवाका पुत्र राक्षसराज रावण हूँ । मैं तुम्हें पानेकी इच्छासे सन्तप्त था; अतः इस समय तुम्हें ले जानेके लिये यहाँ आया हूँ ॥४५॥ उस मुनिवेषधारी रामसे तुम्हें क्या मिलेगा । तुम मुझसे प्रेम करो और इन वनवासके दुःखोंसे छूटकर मेरे साथ नाना प्रकारके भोग भोगो ॥४६॥
श्रुत्वा तद्वचनं सीता भीता किञ्चिदुवाच तम् ।<br>यद्येवं भाषसे मां त्वं नाशमेष्यसि राघवात् ॥४७॥<br>आगमिष्यति रामोऽपि क्षणं तिष्ठ सहानुजः ।<br>मां को धर्षयितुं शक्तो हरेर्भार्यां शशो यथा ॥४८॥<br>रामवाणैर्विभिन्नस्त्वं पतिष्यसि महीतले ।<br>इति सीताचचः श्रुत्वा रावणः क्रोधमूर्च्छितः ॥४९॥<br>स्वरूपं दर्शयामास महापर्वतसन्निभम् ।<br>दशास्यं विंशतिभुजं कालमेघसमद्युतिम् ॥५०॥<br>तद्दृष्ट्वा वनदेव्यश्च भूतानि च वितत्रसुः ।<br>ततो विदार्य धरणीं नखैरुद्धृत्य बाहुभिः ॥५१॥उसके ये वचन सुनकर सीताजीने कुछ डरते हुए उससे कहा—"यदि तू मुझसे ऐसी बात कहेगा तो रामचन्द्रजी तुझे नष्ट कर देंगे ॥४७॥ जरा ठहर तो, भाईके सहित श्रीरामचन्द्रजी अभी आते होंगे ! मेरे साथ कौन बलात्कार कर सकता है ? क्या सिंह-पत्नी-के साथ खरहा भी बलप्रयोग कर सकता है ? ॥४८॥ रामजीके बाणोंसे छिन्न-भिन्न होकर तू अभी पृथिवीतलपर सोवेगा।" सीताजीके ऐसे वचन सुनकर रावणने क्रोधाकुल हो अपना महापर्वताकार रूप दिख-लाया, जिसके दश मुख और बीस भुजाएँ थीं तथा जिसकी काले मेघके समान आभा थी ॥४९-५०॥ उस भयंकर रूपको देखकर वनदेवियाँ और वन्य जीव भयभीत हो गये। तब रावणने (सीताजीके पैरोंके नीचेकी) पृथिवीको नखोंसे खोदकर*उन्हें अपने हाथोंसे उठा लिया

* वाल्मीकि रामायण युद्धकाण्ड सर्ग १३ में रावण कहता है कि एक बार मैंने पुञ्जिकस्थली नामकी अप्सराको आकाशमार्गसे ब्रह्माजीके पास जाते देखा । तब मैंने कामातुर हो उसे बलात्कारसे वस्त्रहीन कर उसके साथ सम्भोग किया । जब उसने यह बात ब्रह्माजीसे जाकर कही तो उन्होंने मुझे शाप दिया कि 'यदि तू आजसे किसी स्त्रीसे बलात्कार करेगा तो तेरे मस्तकके सौ टुकड़े हो जायँगे ।' मालूम होता है इस शापके भयसे ही रावणने सीताजीको स्पर्श नहीं किया । किन्हीं-किन्हींका मत है कि रावणको इसी प्रकारका शाप कुबेरपुत्र नलकूबरने दिया था ।