भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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१३४ अध्यात्मरामायण [ सर्ग ७

तोलयित्वा रथे क्षिप्त्वा ययौ क्षिप्रं विहायसा । हा राम हा लक्ष्मणेति रुदती जनकात्मजा ॥५२॥ भयोद्विग्नमना दीना पश्यन्ती भुवमेव सा । श्रुत्वा तत्क्रन्दितं दीनं सीतायाः पक्षिसत्तमः ॥५३॥ जटायुरुत्थितः शीघ्रं नगाग्रात्तीक्ष्णतुण्डकः । तिष्ठ तिष्ठेति तं प्राह को गच्छति ममाग्रतः ॥५४॥ मुषित्वा लोकनाथस्य भार्यां शून्याद्वनालयात् । शुनको मन्त्रपूतं त्वं पुरोडाशमिवाध्वरे ॥५५॥ इत्युक्त्वा तीक्ष्णतुण्डेन चूर्णयामास तद्रथम् । वाहान्विभेद पादाभ्यां चूर्णयामास तद्धनुः ॥५६॥ ततः सीतां परित्यज्य रावणः खड्गमाददे । चिच्छेद पक्षौ सामर्षः पक्षिराजस्य धीमतः ॥५७॥ पपात किञ्चिच्छेषेण प्राणेन भुवि पक्षिराट् । पुनरन्यरथेनाशु सीतामादाय रावणः ॥५८॥ क्रोशन्ती रामरामेति त्रातारं नाधिगच्छति । हा राम हा जगन्नाथ मां न पश्यसि दुःखिताम् ॥५९॥ रक्षसा नीयमानां स्वां भार्या मोचय राघव । हा लक्ष्मण महाभाग त्राहि मामपराधिनीम् ॥६०॥ वाक्शरेण हतस्त्वं मे क्षन्तुमर्हसि देवर । इत्येवं क्रोशमानां तां रामागमनशङ्कया ॥६१॥ जगाम वायुवेगेन सीतामादाय सत्वरः । विहायसा नीयमाना सीतापश्यदधोमुखी ॥६२॥ पर्वताग्रे स्थितान्पञ्च वानरान्वारिजानना । उत्तरीयार्धखण्डेन विमुच्याभरणादिकम् ॥६३॥ बध्वा चिक्षेप रामाय कथयन्त्विति पर्वते । ततः समुद्रमुल्लङ्घ्य लङ्कां गत्वा स रावणः ॥६४॥

और रथमें डालकर तुरन्त आकाशमार्गसे चल दिया।

उस समय सीताजी अति भयभीत होकर दीन-दृष्टिसे पृथिवीकी ओर देखती हुई 'हा राम ! हा लक्ष्मण !' ऐसा कहकर रोने लगीं। सीताजीका वह आर्तक्रन्दन सुनकर तुरन्त ही तीखी चोंचवाला पक्षिश्रेष्ठ जटायु पहाड़ की चोटीपरसे उठा। और बोला—"अरे ! ठहर, ठहर, यज्ञके मन्त्रपूत पुरोडाशको ले जानेवाले कुत्तेके समान मेरे सामने ही जगन्नाथ श्रीरघुनाथजीकी भार्याको सूने तपोवनसे तू कौन लिये जाता है ? ॥५१-५५॥ जटायुने ऐसा कहकर अपनी तीक्ष्ण चोंचसे रावणके रथको चूर-चूर कर डाला और अपने पञ्जोंसे घोड़ोंको मारकर उसके धनुषके टुकड़े-टुकड़े कर दिये ५६

तब रावणने सीताजीको छोड़कर अपना खड्ग निकाला और झुँझलाकर मतिमान् जटायुके पंख काट डाले ॥ ५७॥ पंख कट जानेसे पक्षिराज जटायु अधमरे होकर पृथिवीपर गिर पड़े। फिर तुरन्त ही रावण सीताजीको दूसरे रथपर चढ़ाकर चलता बना ॥ ५८ ॥

उस समय वह सीता किसी रक्षकको न देखकर वारम्वार रामको पुकारती हुई रो-रोकर कह रही थीं—"हा राम ! हा जगन्नाथ ! क्या आप मुझ दुःखिनीको नहीं देखते ? ॥ ५९॥ हे राघव ! आपकी भार्याको राक्षस लिये जाता है, आप छुड़ाइये। हा महाभाग लक्ष्मण ! मुझ अपराधिनीकी रक्षा करो ॥ ६० ॥ हे देवर ! मैंने तुम्हें वाग्बाण मारे थे, तुम मुझे क्षमा करना।" सीताजीके इस प्रकार रुदन करनेसे रामके आनेकी आशंका करता हुआ रावण उन्हें लेकर वायुके समान अति तीव्र वेगसे चलने लगा।

इस प्रकार आकाशमार्गसे जाते हुए नीचेकी ओर देखती हुई कमलानना सीताजीने एक पर्वत-शिखरपर पाँच वानरोंको बैठे देखा। यह देखकर उन्होंने अपने आभूषणादि उतारकर अपने दुपट्टेके टुकड़ेमें बाँधे और यह कहकर कि 'रामको मेरा समाचार सुना देना' पर्वतपर फेंक दिये।

तदनन्तर रावणने समुद्र पारकर लंकामें पहुँचकर

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